‘स्कूल फीस – क्या ये कृतघ्नता ही है ?’ – भारत भूषण आर गांधी,इटारसी

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क्या ये कृतघ्नता ही है ?

मुझे मेरे एक प्रिय परिचित ने एक कहानी लिखकर भेजी है, उसमें बहुत कुछ ऐसा था जिसका संपादन मुझे बार बार करना पड़ा. उनसे मैंने अनुमति लेकर इसे आपके समक्ष पेश करने लायक इस प्रकार से बनाया है कि कहानी का मूल भाव जीवंत रहे. इसमें एक पिता द्वारा स्कूल प्राचार्य को लिखे जा रहे एक पत्र और उस दौरान उसके मन में क्रोध और आत्मग्लानि के भाव प्रदर्शित होते हैं. .
पिता ने उस स्कूल प्राचार्य को लिखा कि उसका पुत्र पढ़ रहा है. उसने पत्र में लिखा कि उसका बेटा इस वर्ष कक्षा 12 वी का छात्र है. आगे लिखा है कि देश मे कोरोना महामारी की वजह से शिक्षण संस्थानो मे अध्यापन नहीं हो रहा है और स्कूल के लेखाशाखा के द्वारा बारबार कॉल करके स्कूल फीस जमा करने को कहा जा रहा है और मोबाइल पर मेसेज भी आ रहे है. उसने आगे लिखा कि उस समेत परिवारजन स्कूल कार्यप्रणाली और हठधर्मिता से बहुत दुखी और निराश हैं.
पिता अपने पत्र में उन्हें यह समझाने की कोशिश करता है कि प्रबंधन को समझना चाहिए कि जब कोरोना काल मे स्कूल ही नहीं लग रहे है तब स्कूल की फीस क्यो मांगी जा रही है. उसका सवाल यह भी था कि प्रबंधन सोशल मीडिया में फेसबुक, व्हाट्सप आदि पर चल रही स्कूल फी सम्बन्धी चर्चाओं से अनभिज्ञ हैं ?
इन प्लेटफार्म पर आए दिन अनेक अभिभावक और राजनेतिक दल “नो स्कूल नो फीस “ का नारा लगाते हुए देखे जा रहे हैं. उसने पूछा कि क्या उन्हें जब उस सहित देश के लाखों करोड़ों के जीवन यापन करने में कठिनाई हो रही है तब वो कैसे और क्यों स्कूल की फीस दे? जब स्कूल में बच्चों को भेजा नहीं जा रहा और न ही किसी प्रकार की कोई शैक्षणिक गतिविधि ही हो रही हैं तो फीस की मांग न की जाए. उसने तल्खी भी दिखाई कि बच्चों को “टेस्टिंग किट” नहीं समझना चाहिए, प्रबंधन का यही रवैया रहा तो पालकगण ऐसे में अपने बच्चों को स्कूल कैसे भेजेगे. पिता ने आगे लिखा था कि पत्र लिखते समय उसके मन मे आपके प्रति और स्कूल के प्रति बेहद नाराजी का भाव था और अपने एक जागरूक अभिभावक होने का साहस दिखाया था.
कहानी में उल्लेख है कि जब वो पत्र लिख रहा था तब उनके 6 फुट ऊँचा लंबे गोरे बेटे ने आवाज लगा दी थी कि सब कुछ छोड़कर उसे ऑनलाइन क्लास अटेंड करते देख लो. जब वो बेटे के पास आकर खड़ा हो जाता है तब उसका बेटा कहता है कि उसे उसकी ऑनलाइन क्लास में बहुत तारीफ मिल रही है. आईआईटी लेवल के टीचर्स भी उसके पढाई के तौर तरीकों के साथ उसकी विषयों पर अच्छी पकड़ की प्रशंसा करते हुए करते हुए कह रहे हैं कि स्कूल मे उसकी क्लास को अच्छे से पढाया गया है. बेटा उत्साहित होकर कहता जा रहा था कि स्कूल टीचिंग के कारण उसकी नीव बहुत मजबूत है.
बेटे के मुंह से यह सब सुनते ही पिता का भाव बदल गया और वह खुद पर शर्मिंदगी महसूस करने लगा. बेटे के पास से वापस अपनी टेबल की ओर कदम बढ़ाते बढ़ाते उसकी आँखों के सामने बेटे की नर्सरी से क्लास फर्स्ट में जाना फिर प्राइमरी क्लास पूरी करके मिडिल क्लास में जाना, फिर हाई स्कूल पास करके इंटर मीडिएट क्लास में क्लास इलेवेंथ पास करने तक के दृश्य जल्दी जल्दी तैरने लगे थे. वो कुर्सी पर लगभग निढाल सा होकर बैठ गया उसे याद आने लगा था कि बेटे को जब नर्सरी कक्षा में एडमिट कराया था तब वो तीन साल का था, तब वह स्कूल में कभी रोने लगता तो उसकी क्लास टीचर उसे कैसे चुप करा दिया करती थी कैसे वो उसके टिफिन को खोलने में मदद करती थी और कभी कभी उसे और क्लास के दुसरे बच्चों को अपने हाथ से भी खिला दिया करती थी. स्कूल में नींद आ जाने पर झूले मे सुलाया दिया जाता था, खेलने को खिलौने भी दिए जाते थे. प्राइमरी क्लास की फर्स्ट से फिफ्थ तक उसे अक्षर ज्ञान वाक्य ज्ञान स्कूल से मिला. स्कूल की अन्य एक्टिविटीज में उसे फेंसी ड्रेस, ग्रुप डांस तथा स्पोर्ट्स रूल्स और टीम भावना की समझ भी तो उसे स्कूल से ही मिली. मिडिल क्लासेज में उसने पाठ्यक्रम के विषयों के साथ साथ नैतिकता सीखी थी, अनुशासित रहना सीखा था. हाई स्कूल पढाई के दौरान अपने भविष्य के बारे में सोचना सीखा. और उसे यह भी याद आया कि उसने खेल कूद में टीम भावना के साथ प्रतिस्पर्धा के नियम भी समझे. फुटबॉल बेटे को बहुत प्रिय था तो उसने हार जीत को समझा, खुद का हौसला बढ़ाना और अन्य खिलाडी साथियों का हौसला बढ़ाना भी सीखा. एक बार मैच में गोल करने में असफल रहने पर उसकी निराशा दूर करने के लिए गले लगाकर उसके आंसुओं का वज़न हल्का करने में मदद की थी ये उसे उसके बेटे ने बताया था. और एक मैच जीतने पर प्राचार्य और संचालक ने उसे और पूरी टीम के खिलाडियों उत्साह के साथ बाँहों की झप्पी भी दी थी. उसे याद आया कि प्राचार्य स्कूल की विजयी टीम के साथ मस्त होकर डांस करते भी देखा था. और न जाने क्या उसकी आँखों के सामने फटाफट एक एक करके न जाने कितने ऐसे मौकों की याद दिला गया जिसमें उसके बेटे ने स्कूल से क्या कुछ नहीं सीखा था.
स्कूल में बेटे के सीनियर छात्रों से मिला हौसला और पढाई के लिए नोट्स, स्कूल के माली द्वारा उसे जन्मदिन पर लाकर दिए जाने वाले फल, स्कूल वन के ड्राईवर और कंडक्टर से परस्पर संवाद और विश्वास, स्कूल के वार्षिकोत्सव में कल्चरल टीचर द्वारा रिहर्सल, क्लास टीचर द्वारा एक बार मोच आने पर खुद घर तक छोड़ने आना, बोर्ड परीक्षाओं में टोपर रहने वाले बच्चों के सम्मान में टीचर्स का खड़े होकर तालियाँ बजाना सब ऐसी बातें थी जिन्हें अब याद आ गया था.
इतना सब याद आने के बाद पिता को आत्मग्लानि होने लगी कि जिस स्कूल ने उसके बेटे को हर दिन सँवारने का काम किया और वो उन्हें स्कूल फीस की मांग करने के लिए उलाहना पत्र लिख रहा है. उसे लगने लगा कि जिस स्कूल ने वर्षों तक उसके बेटे सहित सैंकड़ों बच्चों के भविष्य को सँवारने का काम किया उसके प्रति कृतज्ञ होने की जगह कितनी नादानी भरा कदम एक पत्र लिखकर करने जा रहा था.
पिछले पचास वर्षों में स्कूल चारदीवारी के अन्दर पाठ्यक्रमों के साथ साथ बहुत कुछ बदला है. आज जो पालक ५० के आसपास के हो चुके होंगे वो आज भी अपने शिक्षक को सामने देखकर अदर के साथ झुक जाते हैं लेकिन आज कई बार ऐसा देखा जाता है कि बच्चे अपने टीचर को सामने आता देखकर रास्ता बदल लेते है, लेकिन स्कूल पहले भी शिक्षा का मंदिर था और आज भी मंदिर ही है. स्कूल ही वो चार दीवारी है जिसके अन्दर जाने वाला बच्चा पालकों के उस विश्वास के साथ जाते हैं कि वहां से उनका बच्चा एक अच्छा शिक्षित और खुद के पैरों पर खड़े होने लायक तैयार हो सकता है.
आज कोविद१९ की रोकथाम के लिए शासन के दिशानिर्देशों का बहाना लेकर स्कूल न भेजने की दशा में स्कूल के प्रति तात्कालिक रूप से कृतघ्न बन बैठे हैं. कोरोना काल को यह अच्छा मौका मानकर बच्चों की ट्यूशन फीस स्कूल को न देने की रट लगाने लगे हैं. जबकि इस समय घर में रहते हुए न जाने कितने गैरजरूरी खर्चों से मुक्ति मिली हुई है.
इस दृष्टिकोण के चित्रण को निजी विचारों से जोड़कर कहानीकार ने कहानी को ख़त्म करते हुए पिता की ओर से स्कूल संचालक, प्राचार्य, शिक्षक गण और स्कूल स्टाफ के प्रति खेद प्रकट करता बताता है. पिता के उस लिखे पत्र को टुकड़े टुकड़े करके दराज़ से चेकबुक निकल कर बेटे की स्कूल फीस का चेक बनाकर अपने शर्ट की जेब में रखते हुए वो मन ही मन सोचता है कि स्कूल इस सत्र में खुले या न खुले, उसके बेटे को ऑनलाइन वर्चुअल शिक्षा तो मिल ही रही है. उसी से संतोष करेगा और सदैव स्कूल के प्रति सम्मान का भाव रखेगा.
विगत कुछ समय से आए दिन प्रिंट और सोशल मीडिया पर ” नो स्कूल नो फीस” और “हमारे बच्चे टेस्टिंग किट नहीं हैं” जैसे स्लोगन खूब चले, लेकिन ऐसे स्लोगन से प्रभावित होकर शिक्षा के मंदिर को ध्वस्त करना समझदारी नहीं है. शिक्षा के संबंध में एक वार्ता के दौरान मैंने सुना था कि हमारी शिक्षा ऐसी होना चाहिए कि जिसमें हम अपने बच्चों को ज्ञानार्थ शिक्षण संस्थाओं में भेजें और जब उनकी शिक्षा पूर्ण हो तब वो सेवार्थ तैयार होकर निकले. लेकिन आज सब इसे व्यासायिक दृष्टिकोण से देखते हैं, यह गलत है इससे मानव समाज पूरी तरह सभी संबंधों को आर्थिक लाभहानि के फेर में फंसा जा रहा है. देखना यह है जिस नई शिक्षा पद्धति को सरकार ने लागू किया है और जिसका स्वागत किया जा रहा है वो अब कितनी कारगर सिद्ध होने वाली है.

– भारत भूषण आर गांधी,
इटारसी

2 COMMENTS

  1. लेखक के विचारों से पूर्णतह सहमत हूँ| स्कूल एक बिल्डिंग नहीं होती वह एक संस्था एक समाज होती है |वहाँ आपका बच्चा इंसान बनने जाता है | आप सिर्फ एक चलता फिरता पुतला पैदा करते है उसे इंसान तो शिक्षक स्कूल ही बनाता है |यह संस्थान स्वयं नहीं चलता इस चलने के लिए धन एवं संसाधन चाहिए|शिक्षा मूलभूत रूप से शासन के जिम्मे होता है पर अपर्याप्त को पर्याप्त करने के लिए निजी संस्थान भी आगे आते है |संस्थान चलने के लिए संसाधन चाहिए होते है जो बिना पैसे के अर्जित नहीं होते और ये पैसा लाभान्वित छात्र पलक वर्ग से ही आता है | इस महामारी के कारण स्कूल जाना बंद हो गयाहै पर संस्थान से जुड़े लोग तो नहीं मर गए संस्थान तो नहीं मर गया , उनके जीवन यापन और संस्थान चलाने के लिए आने वाली फीस बंद होने से इन सब पर ताले लग जाएंगे | वैसे तो लग जाने दो शिक्षक कोई दूसरा रोज़गार कर लेंगे , स्कूल में भी कुछ और होने लगेगा पर जब महामारी समाप्त होगी उसके साठ स्कूल भी समाप्त हो जायेंगे फिर अगली पीढ़ी का क्या होगा भी एक प्रश्न है जो आपके फीस रोकने के पहले सोचना होगा |

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