काव्यभाषा : भावना के पुष्प -सुषमा दीक्षित शुक्ला कानपुर

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भावना के पुष्प

ये भावना के पुष्प सादर ,
प्रभु समर्पित है तुम्हें।

प्रेम धागे में पिरो कर ,
कर रही अर्पित तुम्हें ।

है कामना अब तो प्रभू ,
कोई ना हमसे भूल हो।

अब प्रेम की गंगा बहे ,
ना नफरतों के शूल हों।

ये कठिन जीवन अग्निपथ,
ना भटक जाऊँ ज्ञान दो ।

बस नेक रस्तों पर चलूँ ,
हरदम तुम्हारा ध्यान हो ।

हम तुम्हारे शिशु प्रभू,
तुम पिता अरु मातु हो ।

बालक अगर कपूत है ,
माता नही कुमातु हो ।

सुन हे!प्रभु परमात्मा ,
तुमसे मेरी याचना ।

निज प्यार से मत दूर कर ,
तेरी शरण की कामना।

© सुषमा दीक्षित शुक्ला
कानपुर

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