काव्यभाषा : ज़िंदगी – मीना पांडेय प्रयागराज , उत्तर प्रदेश

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जिंदगी

खुद को देखा जब आइने में थोड़ा घबरा गई थी मैं,
और जब बन संवर गई,खुद ही शरमा गई थी मैं।।

चेहरे की त्वचा थोड़ी ढीली हुई तो क्या,
उम्र भी थोड़ी बढ़ गई तो क्या, कलर है न??
लगाकर हम भी तो इतराने लगे हैं।।

यह भी इक पड़ाव है जिंदगी का ,हम सबके मध्य आएगा,
बचपन आयी,जवानी आई,तो क्या बुढ़ापा न आएगा।।

समय का बस आप मज़ा लीजिए,
क्या कुछ छूट गया परवाह न कीजिए,
जो है उसे बस जी भर के जिए,
लुत्फ जिंदगी का उठा लीजिए,

आधी से ज्यादा कट गई,न जाने कितने पल बचे है,
यह सब सोचकर न घबराया कीजिए,
जिंदगी है उसे जिंदगी की तरह लिया कीजिए।।

मीना पांडेय
प्रयागराज , उत्तर प्रदेश

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