काव्यभाषा : अनुपम आखेट – चन्द्रकान्त खुंटे लोहर्सी जिला-जांजगीर चाम्पा

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अनुपम आखेट

बहेलिया ने चला एकचाल
गहरी सोच
निकल पड़ा मंथर-मंथर
अरण्य में बिछाऊंगा
जाल
भय सहित,कदम बढ़ाते
ना मिले कहीं सिंह या स्यार
घना-घनघोर
गंभीर-गहन
लिए नील गगन का भाल
खल-खल नाद करती सरिता
श्रवण हृदय में
हलचल होता
भेंट हो न जाये
कहीं तरोठ में काल?

पहुँचा कानन
आनन-फानन
समीर का झोंका सर-सर बहते
दिल धड़कते,चक्षु फड़कते
पैसे का है सवाल
गहन कांतार में धीमे-धीमे
निकाला ढाल
फैलाके विशाल
जाने को उद्धत सन्ध्याकाल
कट -कट करती
रजनी आयी
छाया घना अंधकार
मुस्काता तारा,शुक्र बेचारा
भोर हुई,पहुंचे तत्काल
तरु ओट में जा छिपे
ध्वनि की पड़ी अकाल
निरखते मृग-भालू काल
छायी हर्ष भरपूर कपाल

वही दूर में छम-छम करते
नांचते-गाते मोर-कोयाल
निरख खुशी में
हुए मग्न
ध्यान भटका
लुक-छिप आया मृत्युकाल
तेज भागे,सरपट दौड़े
ज्यो मानो हो भूचाल
आमने-सामने
शेर-शिकार
मंद पड़ गई उसकी चाल
भय में हुआ लाल-कपाल

जब आया पतनकाल
मन मे उठते
अनेक सवाल
कभी आते क्षुद्र सवाल
कभी कर्मो का ख्याल
मन मे होते गंभीर मलाल
निवाला बन विलीन हुआ
सोंचा यही मेरा अंतिमकाल
आया पात्र,छुड़ाया जाल
बीहड़ वनों में भागा
मृग-भल्लाट
विलुप्त हो रहे खग-मवेशी
इसका कौन जिम्मेदार??
आओ मिल-जुल करे देखभाल
स्वप्न में हुआ हाल-बेहाल
नींद टूटी प्रातःकाल।

चन्द्रकान्त खुंटे
लोहर्सी जिला-जांजगीर चाम्पा (छग)
मोबाइल नं.7771871576

1 COMMENT

  1. मेरे द्वारा लिखित कविताओं का प्रकाशन करने के लिये मैं “युवा प्रवर्तक.कॉम”का हृदय से आभारी हूँ।

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