विविध : न्याय पाने में देरी क्यों ? – राहुल कुमार चौधरी, कुरुक्षेत्र

न्याय पाने में देरी क्यों ?

“Justice hurried Justice worried”
“Justice Delayed is Justice Denied”

Justice “जस्टिस” अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जिसका हिन्दी अनुवाद ‘न्याय’ है। न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है, साथ में सम्मानित भी है। इसीलिए जो व्यक्ति ईमानदार और न्यायकर्ता है, जिसके पास न्याय करने का अधिकार है, किसी भी दबाव, विशेषकर सत्ता के दबावों से जो मुक्त है, ‘दूध को दूध और पानी को पानी’ सिद्ध करने की कला जिसे आती है—जनसाधारण उसकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखता है। अदालतों में प्रायः देखा जाता है, अपराधी और निर्दोष आमने–सामने खड़े होते हैं। जज महोदय का ध्यान अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों पर विचार करने से ज्यादा कानून की उन धाराओं को समझने में जुटा होता है, जिनके तहत मुकदमा दायर किया गया है; अथवा जिसके अंतर्गत सुनवाई होनी है। उस समय कानून दोनों से समान व्यवहार का दावा करता है। किंतु आरोपमुक्त सिद्ध होने तक निर्दोष को भी उतनी ही बदनामी और मानसिक यंत्रणा का सामना करना पड़ता है, जितना असली अपराधी को। न्याय व्यवस्था का मुख्य कार्य सिर्फ विवादों को सुलझाना नहीं, बल्कि न्याय की रक्षा करना भी है।

न्याय की परिभाषा
मार्टिन लूथर किंग के अनुसार “अन्याय कहीं भी हो वो हर जगह न्याय के लिए खतरा है।”

    भारतीय अदालतों में केस निपटान में देरी के कारण

1. पुलिस अन्वेषण में विलंब
केसों का देर से निपटान का सबसे बड़ा कारण पुलिस जाँच में देरी है। पुलिस द्वारा आरोप पत्र (Charge sheet )दाखिल करने में देरी होने से केस ट्रायल में भी विलंब होना निश्चित है।
केस से जुड़े विभिन्न व्यक्तियों के बयान दर्ज करने के लिए उनका समय पर न मिल पाना। फोरैंसिक साक्ष्य की जाँच रिपोर्ट का देरी से आना। पुलिस अफसरो के लिए विशेष प्रशिक्षण का अभाव भी केस को लंबित करने का कारक है।

2. सम्मन और वारंट की तामील में विलंब
केस से जुड़े पुलिस और अन्य अफसरों का तबादला एक स्थान से दूसरे स्थान पर हो जाने के कारण कोर्ट द्वारा जारी किया गया सम्मन या वारंट इन्हें समय से नहीं मिल पाता, इसलिए केस से जुड़े अन्य अफसर और पुलिस जाँच अधिकारी की गवाही समय पर न होने के कारण केस में विलंब हो जाता है। और केस जस का तस लंबित रहता है।

3. गवाह परीक्षण में विलंब
गवाह के बिना किसी भी केस का कोई महत्व नहीं रह जाता। केस में दो प्रकार के गवाह होते हैं। बचाव पक्ष गवाह (Defence Witness) और अभियोजन पक्ष गवाह (Prosecution Witness) केस मे इनकी गवाही काफी मायने रखती है, लेकिन बिना आवश्यक सूचना और सम्मन के इनकी गवाही में अनुचित देरी हो जाती है। क्योंकि अदालत के निर्धारित समय और प्रकिया के अनुसार ही गवाहों को बुलाकर उनके ब्यान दर्ज किये जाते हैं।

4. विशेषज्ञ रिपोर्टों का देरी से प्रस्तुतीकरण
क्रिमीनल केसों में पुलिस द्वारा फोरेंसिक नमूने लेकर जाँच के लिए फोरेंसिक जाँच प्रयोगशाला में भेजे जाते हैं। ऐसी प्रयोगशाला प्रत्येक राज्य की राज्य पुलिस अकादमी में स्थित होती है। जहां पर हर रोज काफी संख्या में नमूने जाँच के लिए आते हैं, लेकिन यहां पर कुछ विशेष जाँच के लिए समय और विशेषज्ञ की कमी के कारण रिपोर्ट आने में देरी होना भी केस में विलंब का एक बड़ा कारण बनता है। कई महत्वपूर्ण केसों में विशेषज्ञों को कोर्ट तलब करती है। विशेषज्ञों को एक ही समय में कई अदालत से सम्मन आ जाता है, लेकिन समय के अभाव में, विशेषज्ञ एक समय में एक ही अदालत में पहुँच कर अपनी रिपोर्ट पर सप्ष्टीकरण प्रस्तुत कर सकते हैं।

5. कोर्ट कार्यवाही स्थगित करना
उचित और कानून के तहत जजो, वकीलों द्वारा कोर्ट कार्यवाही स्थगित करना एक हद तक सही माना जा सकता हैं। लेकिन अगर ऐसा नियमित और बेवजह किया जाने लगे तो यह न्याय और न्यायपालिका की गरिमा पर प्रश्न उठाता है, और केसो के समय से निबटान को प्रभावित करता है।

6. अनुचित न्यायालय प्रबंधन
न्यायालय को न्याय का मंदिर कहा जाता है। जिस प्रकार मंदिर में प्रत्येक कार्यविधि निर्धारित ढंग से व्यवस्थित और समयानुसार होती है, ठीक उसी प्रकार न्यायालय में भी ऐसा ही होना चाहिए। ताकि पीड़ित पक्ष को तिरस्कृत होने की बजाय अतिशीघ्र न्याय मिल सके।

7. निर्णय आदेश की घोषणा व हस्ताक्षर में देरी
कई बार हम देखते हैं कि कोर्ट द्वारा कार्यवाही पूर्ण होने के उपरांत फैसला सुरक्षित रख लिया जाता है। मगर निर्णय सुनाने में देरी की जाती है और लंबी तारीखें लगाई जाती हैं, इससे न्याय मिलने में देरी होती है, “Justice Delayed is Justice Denied” कथन सत्य होता नजर आने लगता है।

8. न्यायालयों में अधिक अवकाश
हम सब जानते हैं कि न्यायपालिका में राष्ट्रीय अवकाश के अलावा ग्रीष्मकालीन, शीतकालीन अवकाश का प्रावधान है। इस वजह से कार्य दिवस काफी कम रह जाते हैं। अदालतों में पहले से ही लंबित मामले बहुत अधिक संख्या में है। दिन पर दिन इनमें बढ़ोतरी होती जा रही है। न्यायालय में अधिक अवकाश भी लंबित केसों का एक बड़ा कारण है।

9. जजो की नियुक्ति में देरी
हमारे देश की अदालतों में काफी बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित हैं। इन्हे निपटाने के लिए न्यायपालिका को सामान्य से अधिक त्वरित कदम उठाने के साथ नई, विशेष कोर्ट स्थापित करके अनुभवी और मेहनतकश न्यायधीश नियुक्त करने की आवश्यकता है। क्योंकि जिस तीव्र गति से प्रतिदिन नए केस दर्ज होते उतनी गति से पुराने केस नहीं निपटते।

10. वाणिज्यिक विवाद सुनवाई में विलंब
वाणिज्य मामले कंपनियों और बैंक से संबंधित होते हैं। इनकी जांच के लिए विशेष दक्षता की जरूरत होती है, इन्हे विशेष प्रशिक्षण प्राप्त पुलिस अधिकारी ही सुलझा सकते हैं और तथ्यों को सुचारु ढंग से चार्जसीट में उजागर करके दोषी को सजा दिलवा सकते है। लेकिन जब विशेष प्रशिक्षण प्राप्त न हो तब बैंक, कंपनी और वित्तीय संस्थान जांच अधिकारी को गुमराह करके पुलिस और कोर्ट का कीमती समय बर्बाद करके ऐसे मामलो को लंबित किये रखते हैं। राज्य पुलिस के अधिकारियों को भी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की तर्ज पर हर क्षेत्र से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि इस तरह की समस्या से बचा जा सके और केस जल्दी निपट सकें।

11. भ्रष्टाचार या विशेष अधिनियम वाले मुकद्दमों की सुनवाई में देरी
कुछ केस सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार से संबंधित होते हैं। कुछ केस भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, आयकर अधिनियम, आतंकवाद निरोधक अधिनियम के अंतर्गत दर्ज किए जाते हैं। ऐसे मुकदमे भी काफी समय तक लंबित पड़े रहते है। इनके लिए राज्य मे एक ही विशेष अदालत होती है और उसमे प्रतिदिन नए केस विशेष जांच एजेंसियों ATS, NIA, CBI, ACB, IT द्वारा फाइल किए जाते हैं। इस तरह एक ही विशेष अदालत पर केसो का बोझ बढ़ता रहता है।

12. अधिवक्ता और सरकारी अभियोजक की अनुपस्थिति
केस में दोनो तरफ से दो वकीलों द्वारा पैरवी की जाती है। जिसमे एक तरफ से बचाव पक्ष और दूसरी तरफ से अभियोजक पक्ष का अधिवक्ता होता है। इनमे से कोई भी अपना पक्ष रखने के लिए बेवजह बार-2 अदालत से समय की मांग करता है या अनुपस्थित रहता है तो केस की कार्यवाही मंद पड़ जाती है और केस सही नतीजे तक नहीं पहुँच पाता।

13. अपील कार्यवाही में देरी
हम सभी जानते हैं, कि जिला कोर्ट के आदेश को उच्च न्यायलय, उच्च न्यायलय के आदेश को उच्चतम न्यायलय में चुनौती या अपील का प्रावधान है। लेकिन इन अपीलों को निश्चित समयावधि में दायर न करके उसके बाद कोर्ट का समय खराब किया जाता है। ऐसा करने पर कोर्ट को अपना कीमती समय इन बेवजह की अपीलों को सुनने में लगाना पड़ता है और इनका निष्कर्ष शून्य ही होता है।

14. जनहित याचिका और रिट का दुरुपयोग
हमारा संविधान हमे अधिकार प्रदान करता है कि हम कुछ निश्चित केसों में सीधे ही उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय में याचिका दायर कर सकते हैं। लेकिन कुछ लोग इस प्रावधान का गलत उपयोग करके उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय का कीमती वक्त जाया करते हैं। इस वजह से काफी अन्य केस लंबित रह जाते हैं।

15. गवाहों का बयान से मुकर जाना
कुछ केसो में देखने में आता है कि गवाह अपने ब्यान से मुकर जाते हैं। उनके ऐसा करने से केस की पूरी दिशा ही बदल जाती है, क्योंकि केस गवाहों की गवाही पर ही टिका होता है। ऐसा करने पर अदालत गवाह पर भी अदालत में झूठ बोलने, अदालत को गुमराह करने का केस चला सकती है। लेकिन अक्सर ऐसा नहीं किया जाता। इसी बात का फायदा उठाकर गवाह किसी दबाव या पैसे के लालच में आकर अपने बयान से मुकर जाते हैं और केस को निपटाने में विलंब हो जाता है।

16. अतिरिक्त क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र
निचली अदालतों में जजो के पास काफी बड़ी न्याय सीमा (Jurisdiction) क्षेत्र होता है और सबसे ज्यादा मुकद्दमे भी इन्ही अदालतों में दायर होते हैं। अपील दर अपील उच्चतम न्यायालय तक पहुंचते हैं। और यह भी सच है कि सबसे ज्यादा मामले निचली अदालतों में ही लंबित है। उच्चतम न्यायालय में 60,469 केस उच्च न्यायालयों में 17,62,837 केस और जिला न्यायालयों में 2,54,56,906 केस लंबित हैं।

17. सिविल, आपराधिक और वाणिज्यिक मामले एक ही अदालत द्वारा सुनना
उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में विभिन्न प्रकार के केस उनसे संबंधित योग्य और अनुभवी, विशेषज्ञ न्यायधीशों के पास हस्तांतरित किए जाते हैं। ताकि स्टीक रूप से, अतिशीघ्र केसों का निपटारा किया जा सके। लेकिन जिला अदालत में सभी प्रकार के मामले एक ही अदालत द्वारा सुने जाते हैं। इस वजह से ही जिला अदालतों में इतनी अधिक संख्या में केस जस के तस विचाराधीन रहते हैं।

    भारतीय न्यायपालिका में न्याय की गति बढ़ाने के लिए सुझाव।

1. पर्याप्त न्यायधीशों की नियुक्ति की जाए

न्यायपालिका की गति को बढ़ाने के लिए सर्वप्रथम जजों और अदालतों की संख्या बढ़ानी चाहिए। यह एक आसान प्रक्रिया नहीं है। हमे लंबित केसो को निपटाने के लिए हर स्तर पर, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय और निचली अदालत सहित न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। क्योंकि केसो का निवारण अदालत और जजो के हाथों ही संभव है।इसका अन्य कोई विकल्प नहीं है।

2. अदालतों के अवकाश को कम किया जाए

आज हर विभाग चौबीसों घंटे सक्रिय हैं। लेकिन भारतीय न्यायपालिका अभी भी शुरुआती दौर में काम करती है। उनके पास गर्मियों की छुट्टियां, सर्दियों की छुट्टियां और बहुत सारी अन्य छुट्टियां हैं। यह कतई स्वीकार्य नहीं है, जब हम तीन करोड़ बैकलॉग मामलों का सामान ले जा रहे हैं। विशेष नाइट शिफ्ट मजिस्ट्रेट को लागू करने की आवश्यकता है ताकि लोगों को अदालतों के खुलने तक इंतजार न करना पड़े।

3. अदालतों का उचित आधुनिकीकरण:

आज भारत पूरी तरह से डिजीटल देश बनने का सपना देखता है। वास्तव में, हम काफी हद तक सफल रहे हैं। लेकिन अभी भी भारतीय न्यायपालिका पीछे है। भारतीय कानून व्यवस्था को शुरू से अंत तक पूरी तरह से डिजिटल रूप दिया जाना चाहिए। यह बहुत से डॉक्यूमेंट और समय को बचाने में मदद करेगा। पेपर वर्क को बिलकुल समाप्त किया जाना चाहिए।
गवाहों को सम्मन और वारंट डिजिटल माध्यम से भेजें जाए ताकि समय और मैनपावर की बचत हो सके।

4. अधिक फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन

सभी जानते हैं कि केस सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय और अंत में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचता है। इसलिए जब मामले का गंतव्य ज्ञात हो, तब निचली अदालत में मामला पेश करके समय बर्बाद करने की कोई आवश्यकता नहीं है। बल्कि, एक फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू करने की आवश्यकता है ताकि समय बर्बाद किए बिना सीधे सुप्रीम कोर्ट में मामला भेजा जा सके।

5. महत्त्वहीन मामलों की गैर-स्वीकृति

कई बार यह देखा जाता है कि शक्तिशाली राजनीतिक शख्सियत किसी भी तरह के मुकदमे को अदालत में दाखिल करवा देती है। मामला बाद में खारिज कर दिया जाता है, लेकिन यह न्यायपालिका का मूल्यवान समय बर्बाद कर देता है। इसलिए, न्यायाधीशों को स्पष्ट निर्देश होना चाहिए कि वे किस तरह के मामलों को अदालत में स्वीकार कर सकते हैं।

6. भारतीय न्यायिक प्रणाली के साथ-साथ यह भारतीय नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है, कि व्यक्तिगत लाभ के लिए झूठे मामलों में अदालत का समय बर्बाद न करें। किसी को न्याय दिलवाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। छोटे-2 विवाद को अदालत में न ले जाकर आपसी सहमति से सुलझाना चाहिए। ताकि हमारे समय और धन की बचत के साथ ही कोर्ट का समय भी बचे।

7. लोक अदालत, वैकल्पिक विवाद निवारण,
ऑनलाइन विवाद निवारण केंद्र की गति और जागरुकता को सुचारू रूप से बढाना

उपरोक्त निवारण केंद्र सभी जिला अदालतो में बने हुए हैं। मगर उचित सूचना और मार्गदर्शन के अभाव में बहुत कम लोगों तक इनकी पहुँच है। इनमें काफी मामले आपसी सहमति से न्यायधीश की निगरानी में कम समय और बिना खर्च के निपटाए जाते हैं। लेकिन जनसंख्या का एक बहुत बड़ा तबका इनसे अनभिज्ञ है। अदालत द्वारा लोगो को जागरूक किया जाना चाहिए। ताकि जो लोग किसी विवाद को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहते हैं वे इन केंद्रों के माध्यम से समाधान पा सकें।

8. कोर्ट केसो के निपटान के लिए समयबद्धता सुनिश्चित होनी चाहिए।

फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर सभी अदालतो में केसो के लिए समय सीमा तय होनी चाहिए। इससे केस भी जल्दी निपट जाएंगे और अदालत में केसों का बोझ भी हल्का होगा, साथ ही पीड़ित पक्ष को जल्दी न्याय भी मिल जायेगा। इसके अलावा अदालतों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। क्योंकि कई बार निचली अदालत के फैसले उच्च न्यायलय में पलट जाते हैं और उच्च न्यायलय के फैसले को उच्चतम न्यायालय भी बरकरार रखती है।
एक ही केस, वही फाइल और साक्ष्य होने पर, फैसला कैसे बदल जाता है। इसका मतलब ये है कि जिला अदालतों में कुछ अहम पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। उच्च और उच्चतम न्यायालय सभी पहलु को ध्यान में रखते हुए अंतिम निर्णय देती है।

निष्कर्ष

    लेख का मुख्य उद्देश्य न्याय और न्यायपालिका पर प्रकाश डालना है। क्योंकि समाज के लिए न्याय उतना ही आवश्यक हैं जितना एक बीमार के लिए दवा। हमारे देश में न्याय पाने में देरी क्यों होती है। इसके लिए जिम्मेदार कारक कौन से हैं। प्रमुख कारणो को उजागर करने का प्रयास किया है और इन कारणो को दूर करने के लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं। ताकि हमारे समाज में कानून व्यवस्था दुरूस्त रहे और पीड़ित को न्याय अतिशीघ्र मिल सके।

राहुल कुमार चौधरी
स्वतंत्र लेखक,
तकनीकी सहायक,
भारतीय रेलवे
कुरूक्षेत्र, हरियाणा।
ईमेल Rhlkumar456@gmail.com

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