काव्यभाषा : सदा खुश रहो – डॉ.अवधेश तिवारी “भावुक” दिल्ली

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सदा खुश रहो…

सदा खुश रहो , मुस्कराते रहो ,

कोई चेहरा नहीं , जग में ऐसा बना
जो न सुन्दर दिखे , जब ख़ुशी मन में हो
हर पल हँसते रहो , खिलखिलाते रहो ।

सदा खुश रहो , मुस्कराते रहो ।

कामयाबी हमेशा , मिलती उन्हें
जो स्वयं खुश रहें , औरों को खुश रखें
काम ऐसा करो , बात ऐसी कहो ।

सदा खुश रहो , मुस्कराते रहो ।

नाम दुनिया में ,उनका , ही होता अमर
अपने संग-संग में , औरों का हित जो करें
गुनगुनाते रहो , गीत गाते रहो ।

सदा खुश रहो , मुस्कराते रहो ।

काम करते सभी , अपने जीवन में हैं
पर पाते सफलता , कुछ लोग ही
कुछ अलग सा दिखो , कुछ अलग सा रहो ।

सदा खुश रहो , मुस्कराते रहो ।

दुःख , तकलीफ़ , चिन्ता , सभी को तो है
सोचते हैं सभी , बेहतरी के लिए
हालात कैसे भी हों , ‘ भावुक’ हँसते रहो ।

सदा खुश रहो , मुस्कराते रहो…

डॉ.अवधेश तिवारी “भावुक”
दिल्ली

1 COMMENT

  1. भारत को सशक्त, समर्थ बनाने में युवाप्रवर्तक का योगदान अतुलनीय है।

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