काव्यभाषा: धरती गाती है हमे बुलाती है-चन्द्रकांत खुंटे लोहर्सी जिला-जांजगीर चाम्पा

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धरती गाती है हमे बुलाती है

क्षुद्र बूंदों की बौछार,
संतप्त मन
आगोश में भरता,माह आसाढ़
किसान होकर तैयार
शीश मुरैठा
मुस्काता चेहरा
थामे,मेघ का सेहरा
खेत-आंचल फहरा
उसका करता श्रृंगार
सीतल-समीर बहती मानों
धरती गाती है..हमे बुलाती है।

बरखा-बूंद,पड़ती भूमियन पर
मदहोस करती
सौंधी गन्ध उठकर
देती ठंडक
अंतस को
निकलें खेत-खलिहानों की ओर
बीती रात
हो गई भोर
पकड़े हल,जोड़ी बैल
मानो घनिष्ट साथी है।
धरती गाती है..हमे बुलाती है।

किया बोआई,कहीँ निंदाई
शोभना कांसी,हटती उदासी
मेघ गर्जन
वर्षा छम-छम
आया सावन,धरती पावन
मधुर सुहावन
ज्यों हरियाली सा छाती है
तब लगती मानो
धरती गाती है..हमे बुलाती है।

सिर पर चढ़,आ गयी भाद्र
नगाड़ा बजते,
ताड़ित चमकते
धनुष सतरंगी दिखते
धन-धान्य किशोर हुआ
खाद पड़ते
दवाई छिड़कते
मानों तरु सा बढ़ती जाती है
धरती गाती है..हमे बुलाती है

मंथर-मंथर आया अघ्घन
कदम बढ़ाते
संग-सखी
शीतल ऋतु,मन को भाते
जवान फसल
सलामी देकर
धरा को माथ नवाते
मानों धान,सोनरा परिधान
लहलहाती-महमहाती
खुशियों को साथ लाती है
धरती गाती है..हमे बुलाती है।

कटी फसल,बन गयी पूर्णा
गृह-द्वार पहुँची
बनकर पहुना
उतार वेष,कर धारण श्वेत
ज्यो निवाला खिलाती है
पोषण करती
विश्व-जहां का
मां का दर्जा पाती है
अनुपम है,भूमि की गाथा
धरा पर हो
जिसका जन्म
मां का ममत्व पाती है
धरती गाती है..हमे बुलाती है।

चन्द्रकांत खुंटे
लोहर्सी जिला-जांजगीर चाम्पा (छग)

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