विविध : “जय श्रीराम” से “सियापति रामचंद्र की जय” तक- सर्वज्ञ शेखर ,आगरा

सर्वज्ञ शेखर

“जय श्रीराम” से “सियापति रामचंद्र की जय” तक

05 अगस्त को अयोध्या में राम जन्मभूमि का शिलान्यास करते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “जय श्रीराम”के नारे की बजाय “सियापति रामचंद्र की जय, सियावर रामचंद्र की जय” का उद्घोष किया । जबकि वह पहले अपने भाषणों में “जय श्रीराम” का उद्घोष करते रहे हैं ।
प्रधानमंत्री के भाषण से पूर्व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी “जय जय श्रीराम” का ही उद्घोष किया था। “जय श्रीराम” से लेकर “सियापति रामचंद्र की जय” के उद्घोष के बीच का अंतर यदि तलाशते हैं तो बहुत बड़ी बात सामने आती है।

वास्तव में पहले संघ, भाजपा, विश्व हिंदू परिषद व ऐसी ही संस्थाओं के सदस्य, सभी लोग “जय श्रीराम” का नारा लगाते थे, जय श्रीराम का उद्घोष करते थे और उनके विरोधी अलग दिखने के लिए “जय सियाराम” कहते थे ।अयोध्या में भी “जय सियाराम” या “सिया पति रामचंद्र” ही बोला जाता है ।लेकिन हुआ यह कि “जय श्रीराम” का नारा कुछ आक्रामक सा हो गया ।”जय श्रीराम” के नारे के साथ भीड़ हिंसा, “जय श्रीराम” के नारे के साथ मुट्ठी भींच कर प्रदर्शन करना, “जय श्रीराम” के नारे के साथ अधिकारियों से अभद्रता करना,आंदोलन करना, कुछ ऐसा हो गया कि “जय श्री राम” का नारा पावन होते हुए भी, पवित्र होते हुए भी,उसकी संलिप्तता आक्रामकता से हो गई। जैसे ‘श्रद्धांजलि’ शब्द बहुत अच्छा है, श्रद्धांजलि जीवित व्यक्ति को जन्मदिवस पर भी दी जा सकती है । लेकिन ‘श्रद्धांजलि’ मृत्यु उपरांत, या पुण्यतिथि से या मृत व्यक्ति की जन्म जयंती से जुड़ गई है । इस शब्द का प्रयोग कहीं और नहीं होता । क्योंकि इस शब्द की संलिप्तता मृत्यु उपरांत से हो गई है।

प्रधानमंत्री अपने आप को आक्रामक होता नहीं दिखाना चाहते थे,क्योंकि यह एक धार्मिक कार्यक्रम था और वह यजमान के रूप में उपस्थित थे। “जय श्रीराम” के नारे के साथ मुट्ठी भींची जाती हैं जबकि “सियापति रामचंद्र की जय हो” का उद्घोष दोनों हाथ ऊपर उठाकर किया जाता है। जैसे कि “हर-हर महादेव” के समय दोनों हाथों को उठाया जाता है या “जय श्रीराधे” या अन्य धार्मिक उद्घोषों के समय दोनों हाथ ऊपरउठाए जाते हैं ।हाथ ऊपर उठाके जो उद्घोष किया जाता है वह प्रार्थना होता है,ईश्वर से जुड़ने का मन्तव्य होता है और मुट्ठी भींच के जो उद्घोष किया जाता है वह प्रार्थना नहीं होती , वह जोश होता है, जैसे “भारत माता की जय” बोलते समय।

भगवान राम न कभीआक्रामक रहे और न विस्तार वादी ।उन्होंने राक्षसों का विनाश किया, दुष्टों का दलन किया,लेकिन हमेशा संयम के साथ, धैर्य के साथ और मर्यादाओं के पालन के साथ ।युद्ध उनके लिए आखिरी विकल्प था ।उन्होंने बहुत प्रयास किया कि रावण बिना युद्ध किए सीता जी को वापस कर दे । इस उपक्रम में उन्होंने हनुमान जी को और अंगद को संदेश लेकर भी रावण के पास भेजा। लेकिन जब रावण नहीं माना तब उन्हें युद्ध करना पड़ा ।
युद्ध में भी उन्होंने कभी मर्यादाओं का त्याग नहीं किया ।जब किष्किंधा नरेश बालि का उन्होंने वध किया तो किष्किंधा का राज्य अपने नाम नहीं किया बल्कि सुग्रीव के नाम किया ।रावण का वध करके जब श्री लंका पर विजय प्राप्त की तब भी उन्होंने श्रीलंका को अपना राज्य बनाने की बजाय विभीषण को वहां का राजा घोषित किया ।श्रीराम चाहते तो रावण से युद्ध करने के लिए अयोध्या से चतुर्दिक विजयी सेना को बुला सकते थे ।परंतु उन्होंने आत्मनिर्भरता दिखाई और अयोध्या की सेना की बजाय वनवासियों व वानर सेना का उन्होंने चयन किया , उनको युद्ध में दक्ष किया और उन्हीं के बल पर विजय प्राप्त की ।यह थी उनकी आत्मनिर्भरता।

भगवान राम के राज्य में सभी को अपने-अपने धर्म के अनुसार पूजा करने की छूट थी । भगवान राम किसी एक धर्म के नहीं बल्कि सभी धर्मों के पूज्य थे,पूज्य हैं। सभी उनके अनुयाई थे ।रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-

*दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं *स्वधर्म* निरत श्रुति नीती॥

‘रामराज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

– सर्वज्ञ शेखर
स्वतंत्र लेखक, साहित्यकार

सेक्टर 5/49
आवास विकास कॉलोनी
सिकन्दरा ,आगरा
उत्तर प्रदेश 282007

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