काव्यभाषा : …और वह दिन कब आएगा ? -सत्येंद्र सिंह, पुणे

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और वह दिन कब आएगा

राम तुम जीवन हो
जीवन का आधार हो
सदियों प्रतीक्षा बाद
अनेकानेक
कुर्बानियों के बाद
वह दिन आ गया
राम मंदिर का
भूमि पूजन हो गया
पर हे राम
तुम्हारे पदचिन्हों पर चलकर
हम जीवन सुधारेंगे
त्याग बलिदान का
आदर्श स्थापित करेंगे।
और/
वह दिन कब आएगा जब
कुर्सीधारी घोषणा करदे कि
तुम नहीं चाहते मुझे कुर्सी पर
तो तुम्हीं संभालो और यह लो
मेरा स्वैच्छिक त्यागपत्र।
वह दिन कब आएगा जब
उद्योगपति कहेगा कि तुम्हारे जीवन
या आधे जीवन के श्रम के फलस्वरूप
मैं उद्योगपति बना और
मेरा व्यवसाय निष्कंटक चला
पर आज‌ जब विपत्ति के समय
उत्पादन कम हो गया है तो
मेरे श्रमिक साथियों जो कुछ है
उसीमें हम तुम पेट की अग्नि बुझाएंगे,
साथ जिये हैं साथ मरेंगे ,
अकेले नहीं मरने देंगे।
वह दिन कब आएगा जब
जन जन कह उठेगा कि
अखबार वालों
मुद्रण करने वालो
मूर्ति बनाने वालो
मीडिया वालों
तुमने अपने परिश्रम से
हमारा जीवन संभारा है
खबरों से सचेत रखा है
जीवन संचालन में सहारा दिया है
पर्व त्यौहार मनाने में
साथ दिया है
मनोरंजन कर सुख दिया है
तो संकट काल में
हम भी तुम्हारा साथ
नहीं छोड़ेंगे
आधा पेट भरा रखकर
खरीदेंगे अखबार मूर्तियां
और तुम्हारा भी
आधा पेट भरेंगे।
वह दिन कब आएगा जब
भक्त कहेंगे कि
मंदिर मस्जिद चर्च के पुजारियों
तुमने हमारे भगवान को
श्रमपूर्वक संभाला
अब तुम्हें संभालने की
हमारी बारी है।
वह दिन कब आएगा जब
सरकारें कहेंगी
हे जनता जनार्दन
तुमने अपने कमाए धन से
मत बल से सरकार
बनाई है
व्यवस्था चलाई है
तो हम किसी को
बेरोजगार नहीं होने देंगे
हम भूखे रह लेंगे पर
किसी को भूखा
न रहने देंगे,
तुम्हारे विश्वास को
टूटने नहीं देंगे।

सत्येंद्र सिंह,
पुणे

6 COMMENTS

  1. श्री सत्येन्द्र सिंह जी की रचना रसों से परिपूर्ण है । राम पर एक अलग तरह की इस कृति में की मनोवैज्ञानिक पहलू है। रचनाकार का अभिनंदन और बधाई

  2. आज के वर्तमान में श्री राम जी का नया अवलोकन।हर किसी के कष्ट को जानने के लिये करुणामय पुकार। बधाई!💐💐

  3. सत्येंद्र सिह के प्रगतिशील विचारों का स्वागत किया जाना चाहिए।

    श्रीराम निवारिया

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