समीक्षा: ‘वारांगना – व्यथांजलि’ -समीक्षक- कवि मुकेश मोलवा,इंदौर

पुस्तक समीक्षा-
वारांगना – व्यथांजलि

व्यथान्जलि एक बड़ी वेदना की सच्ची अभिव्यक्ति है..वारांगना काव्यसंग्रह न होकर युगों की पीड़ा का कोमल चित्रण है…वारांगना कौन के प्रश्न के उत्तर में कवि स्वयं लिखता “स्त्री होकर स्त्रीत्व हारती..जग में रहकर खुद को मारती” कैसे के जवाब को ऐसे निरूपित किया- छूटा बचपन अल्हड़ जवानी..दहलीज पर भूख उसे ले आई…उसके चित्त में कौन -दिन की रोशनी उसे न भावे..शाम ढले सब पास आ जावे… क्या कहती वारांगना…को कवि लिखता है-साज जो थे नही राज बनकर रह गए…वारांगना तुम कैसे जी पाती… तुम कितना सह जाती. .तुम कैसे घाव छुपाती..ये दोष कैसा ..अपना कौन था…वारांगना चुप रही सदा किन्तु कवि ने इन समस्त प्रश्नों के उत्तर जिस चित्रण के साथ दिए उन उत्तरों से पाठक निरुत्तर हो जाता है…तुम कैसे रहती… कुछ न कह पाती ..कही न उसने सुख पाया.. अमानक नही है कमलदल सारे…विरहणी को यूं भला कौन पुकारे…कवि वारांगना के मन का वाचक होकर लिखता है…अर्घ्य दिनकर को दे जाती..अर्थ हिमालय से ले आती…व्यथा की अभिव्यक्ति में कवि ने वो सब कहा जो पीर की पराकाष्ठा है..झूठ के आलिंगन में सत्य केवल मौन है…सच कह दु तो इतनी सरलता से सहज शब्दो मे पीड़ा को शब्द देने का हुनर..काव्यात्मक रूप से करने पर मैं आज डॉक्टर अर्पण जैन अविचल जी को बधाई देता हूं”.. जो अच्छी कविता पढ़ना चाहते है एक बार वारांगना अवश्य पढ़ें…पुरुष होकर स्त्रीत्व की पैरवी और पैरवी भी उसकी जो जग का मैला खुद ढोती है…

पुस्तक- वारांगना – व्यथांजलि
लेखक- डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’
प्रकाशक- संस्मय प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- 70 रुपये मात्र

समीक्षक- कवि मुकेश मोलवा,इंदौर
09893017703

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