काव्यभाषा : कुण्डलियां -कवि कौशिक बिलासपुर छत्तीसगढ़

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कुणडलियां

महेश्वर शिव जटाधरे, हे जग तारणहार।
भालचंद्र गंगाधरे, करुणा के अवतार।।

करुणा के अवतार, जगत के तुम रखवाले।
भूपति दीनदयाल, हलाहल पीने वाले।।

गहे शरण सब देव, भक्ति आपकी अति सुखकर।
करते दुख का नाश, भक्तों के शिव महेश्वर।।

कवि कौशिक
बिलासपुर छत्तीसगढ़

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