काव्यभाषा: कभी कभी -आर एस माथुर इंदौर

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कभी कभी

कभी-कभी होता है ऐसा
कि तुम आईने में देखते हो
अपने को और नहीं पाते हो
वैसा जैसा चाहते थे तुम होते लेकिन जो सच है उससे
मुंह चुराना या फिर आईने को उठाकर कहीं पर छुपाना
तुम्हें खुद ही वंचित कर देगा अपने आपको जानने से
थोड़ा बहुत कम
ज्यादा अच्छा या बुरा
जैसा है वैसा है तो रहने दो
ऐसा ही रहने दो
आने दो पड़ोस से किसी फूल की खुशबू ,गुजरने दो कारों का काफिला
जो ना रुके तुम्हारे दरवाजे पर होने दो दूसरे के बच्चों को
परीक्षा में उत्तीर्ण
लगने दो किसी के लड़के की नौकरी ,ठीक होने दो संबंध
पड़ोसी की बेटी का
निकलने दो किसी और की भी लॉटरी मुस्कुराओ
किसी की उपलब्धि देख
गृह प्रवेश में जाओ और खुश हो कि तुमसे पहले वह घर बना पाया तुमसे अच्छा मकान
तुम्हारा भी बनेगा जब
वह भी खुश होगा
लेकिन इस पर किसी का नियंत्रण नहीं होगा
जो हो रहा है होने दो
यदि तुम ही कर पाते
तो सारा कुछ अच्छा ही होता
या जितना अच्छा हो रहा है
शायद वह भी रह जाता।

आर एस माथुर
इंदौर

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