काव्यभाषा: रक्षा बंधन -शिवेन्द्र मिश्र ‘शिव’ मैगलगंज-खीरी (उ०प्र)

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रक्षा बंधन
विधा – दोहा

कच्चे धागे मे छिपा, निश्छल प्रेम दुलार।
बहन भ्रात के नेह का, राखी है त्यौहार।।०१

राखी नेह प्रतीक है, समझ नही श्रृंगार।
हर धागे में है भरा, अनुपम प्यार-दुलार।।०२

राखी, अक्षत, रोचना, से करती श्रृंगार।
लेती रक्षा का वचन, दे आशीष अपार।।०३

राखी बंधन प्रेम का, भ्रात न धन से तोल।
कच्चे धागे का कभी, चुका न सकता मोल।।०४

रक्षाबंधन की रखें, भाई हरदम लाज।
यही ईश से कामना, करता है ‘शिव’ आज।।०५

क्यों खिलने से पूर्व ही, देते कुचल गुलाब।
बेहद चिंता का विषय,सोचें तनिक जनाब।0)०६

जब माँ के ही गर्भ में, कन्या को दें मार।
फिर भाई को किस तरह, मिले बहन का प्यार।०७

धन दौलत उपहार की,नही बहन को चाह।
माँगे भाई के लिए, खुशहाली की राह।।०८

राखी बंधन प्रेम का, भ्रात न धन से तोल।
कच्चे धागे का कभी, चुका न सकता मोल।।०९

बहन, भ्रात के हाँथ में, बाँधे रेशम डोर।
ईश्वर से करती दुआ, प्रीत न हो कमजोर।१०

रक्षाबंधन पर्व पर, लें यह दृढ संकल्प।
कभी न होगा प्रीत का, ये संबंध अकल्प।।११

शिवेन्द्र मिश्र ‘शिव’
मैगलगंज-खीरी (उ०प्र)

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  1. मेरे सृजन को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार संपादक महोदय जी का।

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