लघुकथा : ऑन-ऑफ – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

ऑन-ऑफ लघुकथा

“चलो अब सो भी जाओ… रात भर खिड़की के पास ही खड़ी रहोगी क्या….”
“क्या करूँ …माँ हूँ न..आज पूरे दस दिन हो गए हैं दोनों को हॉस्पिटल गए….”वह पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए बुदबुदाई..
“रोज प्रार्थना करती हूं रब से ….राजी खुशी घर वापस आ जाएं।”
“तुम्हें तो कोई चिंता है नही …मैंने देखा था दोनों के चेहरे को ..आंखों के नीचे काले दाग साफ दिखाई दे रहे थे वीडियो कॉल में..।बहुत कमजोर हो गए हैं बच्चे…।घर आये तो अपने हाथों से बना भोजन खिलाऊंगी दोनों को।देखना कुछ ही दिनों में फिर पहले से चहकने लगेंगे दोनों”
“हाँ.. हाँ.. ठीक है ..चलो सोने की तैयारी करो..”मैंने उसे दूध का गिलास थमाते हुए कहा।”तुम अपना चेहरा भी तो देखो आईने में कैसा पीला पड़ता जा रहा है।”
“आ तो रहे हैं कल घर…कर लेना मन के सब चाव पूरे..।वैसे मुझे तो याद नही आ रहा हमने आखिरी बार कब साथ मिल बैठ कर भोजन किया होगा ।अभिषेक तो आते ही फ्रेश होने के नाम पर ऊपर चला जाता है और बहू द्वारा पहले से ऑनलाइन ऑर्डर किया स्वादिष्ट खाना मैं रिसीव कर के ऊपर पहुंचा देता हूँ।दोपहर को दोनों अपने अपने ऑफिस में लंच कर ही लेते हैं।सुबह की बेड टी तुम ऊपर पहुंचा देती हो…।”
“भागवान बच्चे अब बड़े हो गए हैं।अपना ख्याल खुद रख सकते हैं।” मैंने उसे समझाते हुए खुद को बहलाने की कोशिश की ..”हमारी-तुम्हारी जरूरत अब उन्हें महसूस नही होती।वो तो भला हो इस महामारी का जो उन्हें अब घर और माँ के हाथों का स्वाद याद आ रहा है…”
“चाहे जो भी हो… हैं तो हमारे बच्चे ही..हम ख्याल नही रखेंगे तो क्या बाहर वाले रखेंगे।ऐसे में तो वैसे भी कोई पास नही फटकता।”
“चलो आप भी सो जाओ..”उसने दूध का गिलास खाली कर टेबल पर रखते हुए कहा..”सुबह जाना है उन्हें लेने…कल छुट्टी मिलने वाली है।सीधे घर लाना…मैं उनका मनपसंद भोजन तैयार कर के रखूंगी।”
“और हाँ मंदिर होते हुए भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए हॉस्पिटल जाना..।”
“ठीक है भई… सोएंगे तो ही न उठेंगे सवेरे..।वैसे भी डिस्चार्ज होते-होते दोपहर तो हो ही जाएगी…अभिषेक ने कहा तो है फोन करूंगा तभी आना…।”
उधर घर की मुंडेर पर चिड़ियों का चहकना शुरू हुआ और इधर भागवान ने भी फुदकना शुरू कर दिया ।सारा घर बुहारते हुए मुझे आदेशित किया “अब उठ भी जाओ..बगीचे से फूल तोड़ कर गुलदस्ता बनाओ अपने हाथों से ..दोनों का स्वागत नही करना है क्या..।”और बातों ही बातों में उसने भोजन की लंबी फेहरिस्त सुना दी।अभिषेक के मनपंसद पुलाव और गुलाबजामुन का जिक्र आते ही मैं भी शीघ्रता से वॉशरूम की ओर चल दिया।उसके खाने में कुछ बात तो थी..जो खाने वाला चटखारे लिये बिना नही सकता था।
सूरज सर पर आ गया था…और हम दोनों अपने काम निबटा कर अभिषेक के फोन का इंतजार कर रहे थे…”चलो आप तो भोजन कर लो.. ”
नही भागो ले आऊँ पहले उन्हें…फिर साथ बैठ कर ही खाएंगे…”मैंने उसके बनाये विविध व्यंजनों की खुशबू को झटकते हुए कहा…।
दोपहर के तीन बजे थे जब फोन आया “पापा…डिस्चार्ज की कार्यवाही पूरी हो गई है…।हम दोनों ठीक हो गए हैं..माँ से कहना चिंता न करे..।अनूप आ गया है हमें लेने …।उसने हमारे ठीक होने की खुशी में अपने घर दावत रखी है।वह रात दावत के बाद हमें घर छोड़ देगा…।आप लोग हमारी राह मत देखना….हम खुद आ जाएंगे…।”
फोन का स्पीकर *ऑन* था..पर भागो का कुछ देर पहले का फूल सा खिला चेहरा *ऑफ़* हो चुका था।
बच्चों के स्वागत सत्कार के लिए तैयार गुलदस्ता भागो को थमाते हुए मैं उसे रसोई की ओर ले गया।”चल भागो मुझे तो बहुत जोरों की भूख लगी है..परोसो खाना हम दोनों ही खाएंगे..”मैंने उसकी कमर में चिमटी काटते हुए कहा।वह भी मेरी तरफ देख मुस्कुरा उठी…शायद मेरी खुशी के लिए..।क्योंकि वह जानती थी कि पति-पत्नी के आपसी समन्वय से ही एक दूसरे की खुशी *ऑन-ऑफ* होती है।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

3 COMMENTS

  1. वाह,वाहहह, आपकी संवेदनशील लेखनी से निकली एक और अति उत्कृष्ट रचना। 👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏

  2. आदरिणीय देवेन्द्र सोनी जी का आभार युवा प्रवर्तक में स्थान देने के लिये

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here