विविध : मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं आज भी प्रासंगिक -प्रो.गोवर्धन प्रसाद सूर्यवंशी जांजगीर

40

Email

मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं आज भी प्रासंगिक

हिंदी साहित्य जगत के उपन्यास एवं कथा साहित्य में मुंशी प्रेमचंद का महत्वपूर्ण योगदान है। मुंशी प्रेमचंद ने कहानी के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया जिसके कारण कहानी के एक युग का नामकरण प्रेमचंद युग के रूप में हुआ। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें “उपन्यास सम्राट” से संबोधित किया। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय है जिसे नवाबराय एवं मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। उनके द्वारा लिखित रचनाएं हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन समय के रीति रिवाज, परंपरा, युगीन समस्या, देश प्रेम, समाज सेवा आदि का वर्णन मिलता है जो आज भी प्रासंगिक है।

प्रेमचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास लमही नामक गांव में 31 जुलाई 1880 हुआ था। इनके पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था। प्रेमचंद प्रारंभ में नवाबराय के नाम से उर्दू में लिखा करते थे 1908 में उनकी कहानी संग्रह “सोजे-वतन” प्रकाशित हुआ था जिसे अंग्रेजी सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था “सोजे-वतन” में राष्ट्रप्रेम से संबंधित कहानियां संकलित थी जिसका हिंदी अर्थ “देश का दर्द” होता है। मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी उर्दू मिश्रित भाषा में कहानियों एवं उपन्यासों का सृजन आरंभ किया था। वे उर्दू में हमखुर्मा व हम सवाब, असरारे मआबिद, बजारे-हुस्न जैसी उपन्यासों की रचना चुके थे। मुंशी प्रेमचंद के मित्र दयानारायण निगम ने नवाब राय के स्थान पर हिंदी में प्रेमचंद के नाम से लिखने के लिए कहा।

प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जीवन में घटने वाली घटनाओं का सूक्ष्मता से चित्रण किया है। प्रेमचंद की कहानियों में यथार्थवादी विचारधारा का वर्णन मिलता है जिसमें जीवन के सभी पक्षों का वर्णन मिलता है। जिनमें तत्कालीन समय में व्याप्त किसान-मजदूरों की समस्या, बहु-विवाह, बाल विवाह, सामाजिक कुरीतियां, छुआछूत, ऊंच-नीच, सामाजिक-आर्थिक शोषण, स्वतंत्रता संग्राम, समाज सुधार, देश प्रेम,स्त्री विमर्श एवं दलित विमर्श आदि का चित्रण मिलता है।

मुंशी प्रेमचंद ने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखें जिसमें सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, कायाकल्प, निर्मला, वरदान, प्रतिज्ञा, गबन एवं गोदान प्रमुख हैं। प्रेमचंद ने संग्राम, सृष्टि, कर्बला एवं प्रेम की बेदी शीर्षक से नाटक भी लिखे। “दीपदान” शीर्षक से एकांकी का लेखन के अलावा प्रेमचंद ने “टालस्टाय की कहानियों” का अनुवाद एवं “गाल्सवर्दी” के तीन नाटकों का अनुवाद “हड़ताल”, “चांद की डिबिया” और “न्याय” शीर्षक से किया साथ ही बाल मनोविज्ञान एवं बाल कथाओं का लेखन भी किया।

कृषक जीवन की मूल समस्याओं का वर्णन उनकी कृति “गोदान” में मिलता है जिसमें किसानों के ऋणग्रस्तता, साहूकारों का शोषण, परंपरा के नाम पर समाज के ठेकेदारों का शोषण, बेमेल विवाह, मजदूरों की दुर्दशा आदि का बारीकी से वर्णन हुआ है। वर्तमान समय में स्वतंत्रता के पश्चात परिस्थितियां बदल गई है परंतु किसानों की दशा में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। प्रेमचंद युगीन किसान की तरह आज का किसान भी विभिन्न प्रकार की समस्यायों एवं शोषण का शिकार होने पर विवश है। कृषक जीवन की सूक्ष्मता एवं तत्कालीन समाज की दशा का विस्तृत चित्रण को देखकर प्रसिद्ध आलोचक डॉ नगेन्द्र ने “गोदान” को “कृषक संस्कृति का महाकाव्य” कहा है

मुंशी प्रेमचंद के एक और प्रसिद्ध उपन्यास “गबन” की कथावस्तु स्त्रियों की आभूषण प्रियता और युवाओं की बड़बोलेपन की समस्या पर आधारित है। वर्तमान समय में महिलाएं उपन्यास की नायिका “जालपा” की तरह आभूषण के नाम से जान दे रही है और आज का युवा नायक “रमानाथ” की तरह अपनी वास्तविक स्थिति से कहीं अधिक चमक-दमक दिखाने के लिए झूठ का सहारा लेकर कोई भी गलत कार्य में उन्मुख होने में संकोच नहीं कर रहे हैं । मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी एवं उपन्यासों में एक नई विचारधारा आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का चित्रण किया है जो आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से शुरू होकर आलोचनात्मक यथार्थवाद पर समाप्त होता है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में वर्णित समस्याओं का एक सर्वमान्य समाधान निकालने का प्रयास भी किया है।

मुंशी प्रेमचंद ने लगभग 300 से भी अधिक कहानियां लिखी है जो उनके कहानी संग्रह “मानसरोवर” के आठ भागों में संकलित है। उनकी प्रमुख कहानियों में पूस की रात, ईदगाह, सद्गति,पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, कफन, नमक का दरोगा, बड़े घर की बेटी, गुल्ली डंडा, ठाकुर का कुआं, बड़े भाई साहब आदि विशेष उल्लेखनीय है। “पूस की रात” में मुंशी प्रेमचंद ने जहां ऋण ग्रस्त किसान हल्कू की वास्तविक दशा का मार्मिक चित्रण किया है तो “बूढ़ी काकी” में वृद्धावस्था में होने वाली समस्याओं का सजीव चित्रण किया है। इसके अलावा “पंच परमेश्वर” कहानी में पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंच को परमेश्वर के रूप में निरूपित किया है जो जात-पात, रिश्ते-नाते, मित्रता-शत्रुता नहीं देखता है बल्कि परमेश्वर की तरह निष्पक्ष होकर न्याय करता है।

प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे उन्होंने उपन्यास और कहानी के साथ निबंध, नाटक एकांकी संस्मरण, जीवनी और अनुवाद का भी कार्य किया। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया जिसमें “मर्यादा”, “माधुरी” और 1930 में प्रकाशित “हंस” प्रमुख है। इसके अलावा उन्होंने अनेकों पत्र-पत्रिकाओं के लिए समीक्षा, आलेख, निबंध, संपादकीय एवं संस्मरण लिखें जिसमें स्वदेश, जागरण, चांद आदि पत्र-पत्रिकाएं सम्मिलित हैं। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के सभापति के रूप में दिया गया भाषण “लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होते हैं” प्रगतिशील साहित्य के घोषणा पत्र का आधार बना। मुंशी प्रेमचंद की प्रथम कहानी “सौत” सरस्वती पत्रिका के दिसंबर 1915 के अंक में प्रकाशित हुई थी जबकि उनकी अंतिम कहानी कफन 1936 में लिखा गया।

मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का सूक्ष्म चित्रांकन अपनी रचनाओं में किया है। मुंशी प्रेमचंद की जन्मशती पर 1980 में डाक टिकट भी जारी किया गया। प्रेमचंद के साहित्य में तत्कालीन समय के रुढ़ियों के खिलाफ आवाज का स्वर सुनाई देता है। प्रेमचंद की यथार्थवादी कहानी की परंपरा को उनके बाद के परवर्ती कहानीकारों ने आगे बढ़ाया है। उनकी कहानी में यथार्थवादी दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होता है। उनके रचनाओं में वर्णित तत्कालीन समय की समस्याओं एवं रूढ़ियों का प्रभाव वर्तमान समय में भी दिखाई पड़ता है। मुंशी प्रेमचंद एक दूरदर्शी,कालजयी एवं युग प्रवर्तक साहित्यकार थे। उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक है।

प्रो.गोवर्धन प्रसाद सूर्यवंशी
जांजगीर (छ.ग.)

9755724330

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here