काव्य भाषा : सावन का झुला -चंद्रकांत खुंटे

Email

सावन का झूला

उपवन में मिलती चैन-आराम
हम  जाते जहाँ  सुबह- शाम।
खेलते-कुदते मनोरंजन करते
हर  रोज  हमारा  यही  काम।

           बरगद-आम  की  टहनी  में,
           बंधी  रहती  स्नेह  की डोरी।
           संग-सहेली  जाकर  झुलते,
           सब   करते    खूब    मस्ती।

जहां  दिखता  झुला-उपवन,
याद   आती   मेरी   बचपन।
दीदी  सखियां  संग  सहेली,
हमारी  होती   पूरी  पलटन।

करते   बगियों  की   तैयारी,
      एक-एक  कर  बारी – बारी।
      झुलते  सभी  न्यारी – न्यारी,
      हम  सब  की  यही बीमारी।

जब  भी आते  वर्षा  सावन,
याद   आते   रिश्ता  पावन।
हरेली  –  तीज  –  रक्षाबंधन,
झुला    सबके    मनभावन।

   धरती     की     आँगन    में,
   फूल     रंगीन    फैली    थी।
   सावन   के   हरे   मौसम  में,
   सब  सखियां  अलबेली  थी।

दादुर  कोकिल  करते  गुंजन,
कुसुम   रँगीन   खूब   भावन।
मन्द  –  मन्द    समीर   बहन,
सखियां  सभी  झुला – झूलन।
बरगद – आम  की  डोरी  से,
    मिलते  सबको  प्रेम-आनन्द।
    खुशहाली का एक ही साधन,
    झुलना  बनते   दुःख   हारन।

नैन – पटल  पर  स्पर्शो  की,
बार – बार  यह चित्र उभरी।
रस – भरा  सावन का झुला,
जिसे अब – तक नही भूली।

चंद्रकांत खुंटे

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here