काव्यभाषा : पापा – मिष्टी नवीन गोस्वामी द्वारका,नई दिल्ली

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पापा

प्रहरों अपनी बालकनी से आसमां निहारती हूँ पापा,,
मेरे यहाँ से तो तारे भी बहुत ज्यादा नही दिखते
इसलिए मुझे लगता है
जितने दिखते हैं वो सब मेरे अपने हैं,,
जो मुझे देखते हैं ,
जब भी कोई तारा टूटते देखती हूँ ,
लगता है आपने मेरा सन्देश लाने भेजा है..
लेकिन मुझतक कोई नही आता पापा.
थक गई हूँ,कोई कन्धा नज़र नही आता,
सब बोलते हैं आप तारा बन गए हैं,
लेकिन मुझे पता है,आप चाँद हैं,
क्यूंकि तारे तो बहुत सारे होते हैं लेकिन
आप तो एक ही थे ना पापा..
आप चाँद हो पापा,
जो अपनी चांदनी,और शीतलता देते हैं हमेशा..

मिष्टी नवीन गोस्वामी
द्वारका,नई दिल्ली.
..

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