कहानी : राखी – मिष्टी नवीन गोस्वामी ,द्वारका नई दिल्ली

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राखी

वह मेरे सामने वाले घर में रहती थी, हमारी गली इतनी संकरी थी एक पैर हमारे यहां तो दूसरा उनके यहां।
हमेशा डरी सहमी सी आंखों में एक नमी लिए ही देखा मैंने उनको, हमेंशा चेहरे से मुस्कुराती दिखती थी।
राखी आने वाली थी तो मां घर पर नहीं थी वह दीदी के आने से पहले ही मामा के यहां चली जाती थी क्योंकि दीदी राखी पर दोपहर तक आती थी। और फिर महीने 2 महीने मां उनको अपने पास ही रखती। मां को हमेशा से लगता था दीदी की ससुराल वाले उनका ख्याल नहीं रखते इसलिए वह महीने माँ के सिर्फ दी की देख और उनके लाड में ही बीतते।
खैर, मुझे चाय की हुड़क लग रही थी तो सोचा काकी से राम-राम करके चाय नाश्ता भी कर लिया जाए सो मैं उनके घर चला गया वह हमेशा की तरह कुछ काम करती दिखी, राम-राम काकी, मेरी आवाज ने उन्हें चौका दिया, पलट कर देखा मुस्कुराई और फिर काम में जुट गई।
आजा बेटा आजा! और तेरी मां कब तक आएगी नानी के यहां से, गली सूनी सूनी लागे हैं उसके बिना वैसे तो मुझे मालूम है राखी बांधकर ही आएगी।
आज शेखर भी गया है वीणा को लिवाने खातिर
तीज पर ना लिवाकर लाया था ना, जीजा जी का ट्रांसफर हो गया था तो उसी के लिए मना कर दिया था तीजों पर लाने को। अरे पूर्णि जा सुधीर के लिए चाय वाय का इंतजाम कर। माँ ना है घर में इसकी, मामा के गई है राखी खातिर चाय के साथ उपमा और ब्रेड रोल लेकर उन्होंने मुझे बोला, आप कब दुल्हनिया लाओगे, आप भी जाना जीमने घी बुरे की दावत। उनको कभी बोलते नहीं देखा तो चोंक गया, शायद अपना गम छुपाने के लिए ही बोली वरना वह सिर्फ आंखों से ही हेलो बोल मुस्कुरा भर देती थी, अचानक से बोलने पर अचकचा सा गया तो मुस्कुरा भर दिया।
काकी जी ने फिर बोलना शुरू किया यह अभागन जिस दिन से आई उस दिन से मायके वाले सिर्फ दसई(पहली विदा, पग फेरा) पे ही लेने आए ,उसके बाद तो शेखर ही भले ले जाए हैं मिलाने को वरना कोई ना पूछे।
उनकी हंसी फिर आंखों की नमी में बदल गई
जुट गई नंद के आने की तैयारी में।
मैं चाय पीते पीते उन्हें और काकी को सुनता देखता रहा पर कहीं और ही खो गया था पिछले साल जब पता चला की वीणा दी को दोपहर तक वापस जाना है तो फिर कितनी खुश थी वह, कि शायद वह भी पीहर जा पाएंगी लेकिन नहीं गई या नहीं जा पाई, नही ले गए भैया, शेखर भैया का कहना था कि जितने पेट्रोल में तुझे लेकर आना जाना होगा उससे आधा तेरा भाई विदा देगा और उसमें भी अपने को राजा समझेगा और मुझे भिखारी।
कितनी देर तक वह यह सुनकर छत पर भरी आंखों से खड़ी रही थी उनको हँसाने के लिए मैं ही बोल पड़ा, क्या धूप में आंखें सुखाने खड़ी हो और वह जो बारिश का घुमड़ घुमड़ कर आंखों में बरसने को तरसना उफ़्फ़फ़! लेकिन वह कुछ नहीं बोली अबकी बार तो उन्होंने खुद से फोन करके बोला था कि किसी को भेज दो मेरे को लिवाने के लिए। बहुत साल बीते, लेकिन फिर भी।
मैं उधर से निकल गया वो दिमाग में घूमती रही क्या रज्जो जीजी की ससुराल इतनी बुरी है वीणा दी ही दुखी है क्या?
यह बहुत बहुत सुखी है? इनको बात बात पर ताने मिलते हैं उनको कभी घर से निकलते ही नहीं देखा।
पता नहीं, यही सब सोचते सोचते कब आंख लग गई। खैर राखी का दिन आ ही गया, मां दी से बातें कर रही थी दी कितनी खुश लग रही थी क्या सचमुच मायका इतना प्यारा होता है? दी लंबी-लंबी डींगें फेंक रही थी अपनी ससुराल की।
मैं कुछ अनमना सा हुआ इधर-उधर घूम रहा था कि सामने काकीजी दिख गई। जीजी भी आ गई थी शेखर भैया ले आए थे मेरे दिमाग में फिर वही घूमने लगी, वह कहां होंगी? क्या आज
भी अपनी सूनी नम आंखों के साथ मुस्कान बिखेर रही होंगी या चली गई मायके?
दिखीं भी तो नही, सोचते सोचते यकायक पैर काकी के घर की तरफ बढ़ बढ़ गए।
राम राम जीजी,कैसी हो? कहते हुए काकीजी के पैर छुए। निगाह इधर उधर दौड़ाई तो देखा, जीजी के बच्चे को गोद में लिए उसको खिला रही थी बहुत खुश दिख रही थी बच्चे के साथ।
अरे ठीक भैया, आजकल भूल गए हमें, तीन-चार दिन हो गए आये हुए, अब नजर आए हो!
नहीं नहीं जीजी भूला नही, जरा ऑफिस में काम ज्यादा था और घर में रज्जो दी आई हुई है, उनको तो आप जानती हो ना, हा हा हा
चल उठ पूर्णि बच्चे को मुझे दे दे, और जा चाय बना ला। मेरे मना करने के बावजूद चाय नाश्ता आ ही गया। मुझे सिर्फ जानना था कि अबकी राखी पर तो उन्होंने मेरे फोन से चुपचाप फोन किया था फिर क्यों नहीं गई फोन के बावजूद कोई नहीं आया।
इधर उधर की बातें करते हुए मैंने इशारे से पूछ ही लिया वह नहीं चाहती थी कि किसी को भी पता चले इसलिए उन्होंने आरव को गोद में लिया और धीरे-धीरे गुनगुनाने लगी
ओ मैया मेरे बाबुल को भेजो जी
ओ बिटिया तेरा बाबुल तो बूढ़ा री।
ओ मैया मेरे भैया को भेजो जी
ओ बिटिया तेरा भैया तो बालक री।
और दो बूंद ना चाहते हुए भी टपक गईं
मैं समझ गया मैंने गाना सुन रखा था इसलिए इस बार वह नहीं। मैं धूप में आंसू सुखाने चला गया
लेकिन यह क्या उनके कमरे के बाहर एक दुछत्ती बनी हुई थी, जहां कभी किसी को आते जाते नहीं देखा था।
वहां चौक गारी से पेंटिंग बनी हुई थी।
मैं उन्हें देखने के लिए उत्सुकता वश चला गया।
देखा एक पेंटिंग जिसमें एक लड़की बूढ़े से आदमी के गले लगी हुई है।
दूसरी पेंटिंग में टेबल पर मिठाई ओर राखी की प्लेट सजी हुई है, सामने सोफे पर एक नोजवान लड़का और साथ मे दुबली सी एक औरत बनी है, और तीसरे में एक साड़ी वाली लड़की एक बूढ़ी औरत के पैर पर सिर रखकर सोई हुई है और उसकी आंख के कोरो से आंसू गिर रहे है उफ़्फ़फ़ कितना मार्मिक दृश्य, वह नीचे जो गाना गुनगुना रही हैं मुस्कुरा रही हैं कितना दर्द समेटे हैं। भारतीय नारी तुम भी उन 10 पर्सेंट में होती जो आवाज उठाने की कोशिश तो कर रही हैं। संस्कारों में बंधी कितनी टूटती हैं अंदर ही अंदर कांच की तरह और उस कांच की चुभन भी किसी को महसूस भी नहीं होने देतीं।
काश हम नारी को जीवित इंसान समझ पाते, समझ पाते उस बहू को जो किसी की बेटी है। एक जिंदा लाश नहीं। क्या सचमुच लव मैरिज इतनी भयंकर होती है? इनकी तो लव मैरिज भी नहीं बोल सकते वह तो भैया की जबरदस्ती थी उफ़्फ़फ़ भारतीय नारी तेरे संस्कार
राखी जैसे त्योहार पर भी बहु बेटी का अंतर
काश इनका भाई कभी आकर इनके आंसुओं की जुबां समझ पाता?
टेप में गाना लगाकर रिक्शा वाला सामने से निकला –
बाबुल मेरा नैहर छूटो ही जाए।

मैं उसके बाद भारी मन से चल पड़ा, रुक नही पाया।।

मिष्टी नवीन गोस्वामी
द्वारका नई दिल्ली

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