काव्य भाषा : ग़ज़ल – शीला गहलावत, सीरत चंडीगढ़

ग़ज़ल

बस यूँ ही, चलते-चलते मन की बात बोल दूं
अपने दिल के राज, चलते-चलते खोल दूं

ईमली-गुड़ सी बंधी मन की गांठ कैसे खोल दूं
कुछ तुम बोलो, कुछ हम बोले, कैसे बोल दूं

मन की गांठ भी बड़ी अकड़ती, पल्लू झटकती
कह बात वो कुछ यूँ शरमाती,पल्लू झटकती

पल्लू में बंधी छोटी सी गांठ मन को बांध लेती है
उसके ही बस में हो जाता,रिश्ते को बांध लेती है

ईमली-गुड़ सी बंधी मन की गांठ मैं भी खोल दूं
गमले में सजे फूलों की क्यारी जैसे बंधन खोल दूं

महका देती है मन मेरे को परछाई देखूं जब मैं तेरी
फूल,खुश्बू, रंग, भर देती मन को महका जाती, मैं तेरी

रंगरेज की गांठ हर्षाए देती है मन को खुशियाँ देती हैं
लहरिया,बांधनी, पिलिया सज़ा,मन को खुशियाँ देती हैं

कच्चे सूत की गांठ सी, कच्चे धागों में बंधी गांठ खोल दूं
खुलती नहीं टूट जाती है, कच्चे धागों में बंधी गांठ खोल दूं

कुछ तुम बोलो, कुछ हम बोले, मन की बात,रहने भी दो
ईमली-गुड़ सी,खट्टी- मिट्ठी यादें, मन की बात, रहने भी दो

ना तुम बोले, ना हम बोले, कैसे कह दूँ मन की बात
ईमली-गुड़ सी,खट्टी- मीट्ठी यादें,कुछ तुम कुछ हम बोले।

शीला गहलावत, सीरत
चंडीगढ़

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