लघुलेख: अपराध का मानवीकरण -सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र

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लघुलेख
अपराध का मानवीकरण

इस सृष्टि में चौरासी लाख योनियां बताई जाती हैं और मानव अंतिम व श्रेष्ठ योनि। इस श्रेष्ठ योनि के हिस्से में काफी उपलब्धियां दर्ज हैं। उनमें से एक अपराध भी है। अपराध करने के जितने जघन्य व घृणित उपाय खोज निकाले हैं, उतने उपाय हर तरह का प्रशिक्षण प्राप्त और उच्च शिक्षित पुलिस विभाग उससे रक्षा करने के उपाय नहीं ढूंढ़ पाया है। अभी विकास दुबे द्वारा आठ पुलिसकर्मियों की जघन्य हत्या के मामले में दुबे की मृत्यु को पुलिस की उपलब्धि मानकर मानव समाज सुकून की सांस ले ही रहा था कि कानपुर में तीस लाख की फिरौती देने के बावजूद युवक की हत्या का मामला और अब गोरखपुर में पांचवीं कक्षा के छात्र की हत्या का मामला प्रकाश में आने से मानव हृदय विलख पड़ा है। हत्या किसकी हुई, किसने की, कहां हुई, ये समाचार के विषय तो हो सकते हैं, हृदय शांति के नहीं।
किसी जीव की किसी हिंसक पशु ‌द्वारा प्राण लेने की बात तो समझ आती है कि दूसरा जीव आहार हो जाता है, परंतु एक के परिश्रम से अर्जित धन को बलपूर्वक छीनने या हत्या कर देने के मामले तो मानव सभ्यता के विकास पर एक बदनुमा धब्बा ही है। कहते हैं कि नारद के उल्टे उपदेश से डाकू बाल्मीकि कवि बन गये थे, वह भी आदिकवि और ऐसे महानायक को आधार बनाकर ग्रंथ की रचना की कि उस महानायक को ईश्वर मानते हैं और उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करते हैं। लेकिन अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं, नये नये तरीकों से किये जा रहे हैं जबकि हर गली,हर नुक्कड़ पर एक कवि बैठा है। कविता हो रही है, विविध भांति साहित्य रचा जा रहा है पर कोई अपराधी बाल्मीकि जैसा कवि नहीं बन सका और न ही ऐसा ग्रंथ लिखा जा सका जिससे छोटा मोटा अपराधी कवि तो क्या अच्छा मनुष्य ही बन पाता। हां दूसरे बाल्मीकि तुलसीदास को माना जाता है पर है ‌तो बाल्मीकि का पिष्टपेषण ही। तुलसीदास का भी पिष्टपेषण हो रहा है। पर कविता नहीं ‌हो रही। हो रही होती तो विरुदावलि नहीं होती। बाल्मीकि ने, तुलसीदास ने भी ‌विरुदावलि की पर किसकी। उनकी विरुदावलि ने अपने नायक को ईश्वर बना दिया। हिंदी जगत् में विरुदावलि ने अपने नायक को धीरोदात्त गुण धारक बना ‌दिया। सूरदास, मीरबाई और अन्य संत कवि इसी श्रेणी में आते हैं। कबीर ने तो बिना नायक या बिना किसी विरुदावलि के, अपने रचना संसार को ही ऐसा बना दिया कि साहित्य के प्रतिमान ही बदल गये। यही मायने में उन्होंने मानव हृदय पर चोट की और उससे कुछ संत बने, कवि बने। लेकिन उनका पिष्टपेषण निजी अनुभव के बिना नहीं हो सकता था इसलिए संत अधिक बने कवि कम। इसलिए मित्रभाव का निर्माण अधिक हुआ। सब कुछ मिलाकर कहा जाए तो अपराध करने के प्रति एक अंतरभय निर्माण हुआ। इसलिए किसी को अन्याय ‌या अपराध ‌करते देख राह चलते भी आदमी ‌कह दिया करता था कि ईश्वर से तो डरो भाई। उसका प्रभाव पड़ता था।
पर आज कोई प्रभाव नहीं, उल्टे कहने वाला ही डरता है। आज तो ‌कवियों की बाढ़ आ गई है।‌ उनकी विरुदावलि से ईश्वर तो नहीं पर अहंकार जरूर फन उठाने लगा, काम भी किल्लोल करने लगा, ईर्ष्या तो घर घर में पैठ गई, पर अपराध कम नहीं हुए। विरुदावलि एकपक्षीय और शत्रु निर्माता हो गई, व्यक्तिगत ही नहीं सामूहिक शत्रु निर्माता। अगर व्यक्ति दूसरे पक्ष का है तो उसके प्रति कितना भी अन्याय हो रहा हो, अपराध हो रहा हो, शारीरिक मानसिक यातनाएं दी जा रही हों, कवि का हृदय नहीं पसीजता, उसके हृदय में पीड़ा नहीं होती, उस ओर से आंखें फेर लेता है। शायद कविता हृदयहीन हो गई है, कठोर हो गई है। व्यवसायी हो गई है।उसके व्यावसायी बनने का ही यह परिणाम हो। और जब कवि हृदय का यह हाल है तो सामान्य मानव की क्या बात करें। वह तो ‌उदर व अन्य ‌ऐंद्रीयपूर्ति से बाहर ही नहीं निकल पाता।
अपराध के मानवीकरण के परिप्रेक्ष्य में मैंने कवि को ही सामने रखा है, क्योंकि उसकी अंतर्दृष्टि तीक्ष्ण होती है। शासक वर्ग के प्रयासों का अर्थविपर्यय हो सकता है, उसका प्रहार शरीरगत ही होता है पर कविता का प्रहार हृदय पर होता है। इसीलिए मैं कवि को समाज के प्रति अधिक उत्तरदाई मानता हूं। जब आप कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है तो साहित्य सर्जक को यूं ही छोड़ देंगे? इसलिए मानव जिस तरह अपराध का प्रतीक बनता जा रहा है, उसका एक रूप बनता जा रहा है, तो अपराध के इस मानवीकरण को रोकने में केवल कवि ही सफल हो सकता है। इति।

सत्येंद्र सिंह,
पुणे, महाराष्ट्र।

2 COMMENTS

  1. पौराणिक तथ्यों से आलेख विशिष्ट अपराधी कृत्यों का निषेध करता है। आज के वर्तमान समय पर वैचारिक प्रहार।

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