काव्यभाषा : गठबंधन – मिष्टी नवीन गोस्वामी द्वारका,नईदिल्ली

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गठबंधन

सुनो
क्या अंतर था हममें ओर दरवाजों में
हां,हमारी भाँवरें पूरी हो गई थी
लगा दी गई थी एक सांकल हमारे दोनो पर,गठजोड़े की
चल दी थी पीछे पीछे
आगे पहला दरवाजा पीछे से मैं
दूसरा दरवाज़ा
साथ साथ,जन्मों तक साथ रहने की रस्मों कसमों के साथ
समय बीतता गया,
स्वभाव भी बदलता गया
नई दुल्हन पुरानी हुई,पुरुष अहम जाग्रत हुआ
अब दोनों दरवाजे साथ साथ जब भी बन्द होते
भडाके के साथ होते
धीरे धीरे एक दरवाज़ा कुछ ज्यादा बड़ा होता गया
मेरी जगह उस बड़े गेट में छोटी सी दरवाजी सी ने ले ली
जहां से
निकलते ही पैर मारकर धाड़ से
दरवज्जी को बंद कर दिया जाता
जहां मेरा मान सम्मान कम होता गया,
वहीँ वो दरवज्जी भी घटती(छोटी) चली गई।
परिवार बड़ा,खिड़की,रोशनदान सब आ गए
मैं ही सिकुड़ती चली गई
जितना परिवार बढ़ता गया उतनी मैं छोटी होती गई
अब मेरी तरह उस दरवज्जी की जगह भी खत्म होने लगी
खिड़की रौशनदान नए नए आ गए
मेरे भी बहु,दामाद आ गए
मेरी जगह अब सिर्फ कोने में रह गई
खाने पीने तक
वो दरवज्जी भी अब कूड़ा ढांकने के लिए रह गई,,क्योंकि वो बड़ा दरवाजा अब पुराना हो गया
नया घर बनाया गया,लीपा पोती हुई
सब बदल गया
वो बड़ा दरवाज़ा कोने में फालतू समान ढांकने के काम के लिए रख दिया गया
ओर वो दरवज्जी एक दिन
सर्दी में हाथ सेंकते हुए
जला दी गई,राख हो गई
राख हो गई वो और—–
वो सांकल लटकी हुई है आज भी
कोने में
और दरवाज़ा अब उसे देखता रहता है
आंसू भरी निगाह से
लेकिन अब दरवज्जी नही दिखेगी
कभी,
कभी नही
शायद वो दरवाज़ा उसे अगर बराबर रखता,तो आज भी दोनो साथ साथ खुलते बन्द होते।

मिष्टी नवीन गोस्वामी
द्वारका,नईदिल्ली।

2 COMMENTS

  1. मिष्ठी द्वारा लिखित कविता गठबंधन नए प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त प्रभाव पूर्ण है। संभावना से भरी हुई है नयी पीढ़ी।

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