विविध : “सभ्यता और संस्कृति ” की रूपरेखा -स्वेता कृष्णौत राँची, झारखंड

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सभ्यता और संस्कृति

किसी भी देश या समुदाय के लिए उसकी सभ्यता और संस्कृति का विशेष महत्व है । बिना सभ्यता के संस्कृति विकसित नहीं हो सकती और बिना संस्कृति के कोई सभ्यता उन्मुक्त रुप से फल-फूल नहीं सकती । पर सवाल यह भी है कि आखिर सभ्यता और संस्कृति की जरुरत ही क्यों ?
इसका जवाब सरल तो नहीं परंतु उतना कठिन भी नहीं । हम सब की जुबान पर ये दो शब्द हमेशा आते हैं पर कभी हमने गहराइयों से सोचने की चेष्टा नहीं कि , आखिर क्यों हम किसी खास अवसर पर कुर्ता पजामा या साड़ी पहनते हैं ? क्यों माँ कहती है कि बड़ों के पांव छुआ करो ? या हम त्यौहार क्यूँ मनाते हैं ? कुछ के मन में काफी अच्छे-अच्छे वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक उत्तर भी आए होंगे। पर मैं आज ना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात कर रही और ना ही आध्यात्मिकता को बढ़ावा दे रही हूँ। मैं बात कर रही हूँ सैद्धांतिक दृष्टिकोण की। और इस सिद्धांतिक धारणा को साहित्यिक रुप में पीरोने की कोशिश कर रही हूँ।
जब मानव की उत्पत्ति हुई तब ना तो कोई सभ्यता थी और ना ही संस्कृति । मानव उत्पत्ति के सैकड़ों वर्ष बाद के हमें किसी सभ्यता के पुरातत्व मिले। तब सभ्यता तो विकसित हुई पर संस्कृति नहीं । मानव सभ्यता की उत्पत्ति के उपरांत फिर सैकड़ों वर्षों बाद संस्कृति की अवधारणा पैदा हुई । मूलतः सभ्यता का अर्थ मानव जीवन को पशु से भिन्न बनाना है और संस्कृति मानव जीवन की दिशा दिशा निर्धारित करती है। मनुष्य के विकास के साथ ही मानवीय चेतना का विकास शुरु हो चुका था। इसी चेतना ने जन्म दिया वैचारिक धारा को । यहीं से विचारधारा की शुरुआत हुई । एक जैसे विचारधारा का सम्मान करने वालों ने मिलकर एक समाज का निर्माण किया । उस समाज में एक से बढ़कर एक बुद्धिजीवी का जन्म हुआ । उस बुद्धिजीवी वर्ग ने अपने समाज को सशक्त और सभ्य बनाने का बीड़ा उठाया और वहीं से शुरुआत हुई संस्कृति की। एक संस्कार सब जो में अंकित किए जाएँ। संस्कृति का विकास मानव को एक धागे में पिरोकर रखने के लिए किया गया साथ ही मनोरंजन , जो कि आदि काल से ही मानवीय जीवन का भिन्न अंग रहा है, उसके लिए भी संस्कृति को बढ़ावा दिया गया ।
आगे जाकर सभ्यता ने अपने मूल विश्लेषण को पछाड़ते हुए एक वृहित परिभाषा को जन्म दिया । जो मनुष्य को पशुओं से ही नही बल्कि सभ्यता को सभ्यता से भिन्न बनाता है । उदाहरण के लिए पूर्वी सभ्यता , पश्चिमी सभ्यता आदि । उसी प्रकार संस्कृति को भी उसकी आंशिक परिभाषा से परे वृहित परिभाषा का पायदान प्राप्त हुआ। उदहारण के लिए , एक ही सभ्यता में , विभिन्न दायित्व, विभिन्न वेशभूषा, विभिन्न वर्ग आदि रहा । पर इन सब का सार एक ही रहा ये सब सामाजिक रुप से आपस में जुड़े रहे।
बुद्धिजीवी वर्ग बड़ी तेजी से विकास कर रहा था और तब बात आती है सांस्कृतिक बदलाव की । आगे बढ़ते बुद्धिजीवी वर्ग , तो पीछे रह गई आम मानव चेतना के बीच की खाई बढ़ने लगी। तब अपनी समरस्ता को और ऊंचा आयाम देने के लिए बुद्धिजीवी लोगों ने सांस्कृतिक बदलाव किए । अब संस्कृति, समाज को एकाकार करने के लिए ही नहीं बल्कि समाज को एक बंधन में बांध कर उस पर शासन करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा ।
नियम , कानून और दंड की परिभाषा को जन्म दिया गया। एक विवाह, एक परिवार , सती प्रथा , वर्णव्यवस्था आदि जैसे संस्कृतियों का जन्म हुआ । जिसे उच्च तथा बुद्धिजीवी वर्ग ने अपने तर्क से सार्थक करार दिया। यह बात अलग से चिन्हित करने की आवश्यकता नहीं है की स्त्रियों के लिए खास सांस्कृतिक विकृतियों को बढ़ावा दिया गया ।
बदलते युग के साथ हमारी सभ्यता और संस्कृति में काफी बदलाव आए कुछ बदलाव निश्चय ही समाजिक कृतियों को तोड़ कर लाय गए और कुछ बदलाव अपनी संस्कृति को पीछे छोड़ कर लाए गए । बदलाव ही अटल सत्य है ! सभ्यता हो या संस्कृति यह सारे मापदंड मानव को बेहतर से और बेहतर की ओर ले जाने वाले होने चाहिए । अगर सभ्यता या संस्कृति के नाम पर मानवीय संवेदना को कुचला जा रहा हो तो निश्चय ही वो कृत्य इस शब्दावली का हिस्सा नहीं । तुरंत ही समाज को इसका बहिष्कार करना चाहिए । साथ ही अपनी सभ्यता और संस्कृति , जो कि हमारी मानवीय मूल्यों का सार हैं, हमारी दिशा-दिशा निर्धारित करते हैं , हमें अद्वितीय बनाते हैं उनका सम्मान और संरक्षण करना भी एक सभ्य समाज का फर्ज है ।

स्वेता कृष्णौत
राँची, झारखंड

पिन :- 829210

10 COMMENTS

  1. खूबसूरती से अपने विचारो को व्यक्त करना एक कला है, आप जैसे युवा कलाकार को ऊंचाई छूते देर नहीं लगेगी।
    Keep it up.

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