काव्य भाषा : ग़ज़ल – कल्याणी झा राँची, झारखंड

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ग़ज़ल

अगर- ये- इनायत -तुम्हारी- मिलेगी।
हमें -भी -खुशी -दस हजारी -मिलेगी।

हमारी ख़ता की मुआफ़ी करो- अब
हमें क्या- पता था -बिमारी- मिलेगी।

बहुत बढ़ चुका है सितम अब तुम्हारा
नज़र- क्यों -न गीली- हमारी-मिलेगी।

परेशां -सभी- है -अजब -ये– बिमारी
दुआएं- कभी -तो -तुम्हारी- मिलेगी

खड़ी- हाथ- जोड़े- कनक- द्वार -तेरे
दुआओं की बारिश भी प्यारी मिलेगी।

कल्याणी झा
राँची, झारखंड
मौलिक

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