काव्यभाषा – मैं बड़ी हो गई!- माही सिंह, राजपुरा

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मैं बड़ी हो गई!

उस रात चौखट पर ताला,
और पाँव में बेडियाँ पड़ गईं;
चेहरे की मासूमियत,
और वो मासूम मुस्कान झड़ गई;

खेल-खिलौने,गुब्बारे,
आँख-मिचोली ने साथ छोड़ दिया;
हाथों में बेलन-चौकी,
चूल्हे से नाता जोड़ लिया;

यूँ तो बारिश की बूँदों में भीगा करती,
अब कुँए से पानी भर रही हूँ;
यूँ तो घंटो गुड़िया से बातें करती,
अब खुद कठपुतली बन गई हूँ;

सोच रही थी,ये कौन सा मोड़ है जिंदगी का!!

खेल-कूद में बचपन बीता,
आज लाल साड़ी में खड़ी हो गई;
सुबह नींद खुली तो जाना,
मैं बड़ी हो गई,,,,मैं बड़ी हो गई!!

माही सिंह
राजपुरा

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