कहानी : इस रिश्‍ते को क्या नाम दूँ ? -विपिन पवार ,मुम्बई

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इस रिश्‍ते को क्या नाम दूँ ?

– विपिन पवार

उस समय मैं छटवीं कक्षा में था, जब जुलाई माह की भीषण बारिश में नए मास्साब हमारे रेलवे स्कूल में आए। हिंदी प्रदेशों में मास्टर साहब को अपनी सुविधानुसार मास्साब कर लिया गया है । जब मुझे पता चला कि नए मास्साब हिंदी पढ़ायेंगे,तो मैं खुशी से उछल पड़ा,क्योंकि हिंदी मेरा प्रिय विषय था। बाल कविताएं एवं बाल कहानियां लिखना मैंने पांचवी कक्षा से ही प्रारंभ कर दिया था और नए मास्साब जुलाई के अंत में आए थे, तब तक छठवीं की हिंदी एक ऐसे मास्साब को दी गई थी जो न तो हिंदी में बी.ए. थे और न ही उनकी हिंदी पढ़ाने में कोई रुचि थी। उनकी रुचि तो छात्र- छात्राओं को मुर्गा बनाने एवं कूटने में ज्यादा थी। मुझे उस समय और भी अधिक खुशी हुई, जब यह पता चला कि नए मास्साब को छठवीं कक्षा का क्लास टीचर बनाया गया है। किशोरावस्था मनुष्य के जीवन का वसंत कहलाती है । मेरे जीवन में वसंत का आगमन बस हुआ हुआ ही था। वसंत का प्रथम साक्षात्कार होने पर किशोर मन सबके प्रति स्नेह से भर जाता है …बारिश की बूंदों के प्रति…. घास के जंगली फूलों के प्रति…. उफनते नदी नालों के प्रति… शायद इसलिए उस आयु में मेरे मन में उस अनदेखे एवं अनजाने व्यक्तित्व के प्रति स्नेह के भाव प्रस्फुटित हो चुके थे । मैं बड़ी बेसब्री से कक्षा में उनके आने की प्रतीक्षा कर रहा था।
सोमवार को पहला पीरियड था……… हिंदी का। चतुर्भुज जाटव मास्साब ने कक्षा में प्रवेश किया। कद पांच फुट से कुछ इंच ही ज्‍यादा, सिर पर बाल कम, रंग गोरा, साफ धुले हुए तथा लोहा किए हुए कपड़े, चमचमाते काले जूते, हाथ में कक्षा की उपस्थिति पंजी। उनके व्‍यक्तित्‍व में कुल मिलाकर अधिक प्रभावित करने वाली कोई बात नहीं थी। लेकिन चालीस-पैंतालीस मिनट के उस हिंदी के पीरियड के बाद पूरी कक्षा उनकी दीवानी बन चुकी थी।
“ माई सेल्‍फ सी.बी. जाटव……….हिंदी का अध्यापक हूं……..आपका क्लास टीचर। मेरा परिचय आपको मिलता रहेगा…….मैं चाहता हूं कि आप लोग पहले मुझे अपना परिचय दें। ”
यह था जाटव मास्‍साब से मेरा पहला परिचय। खंडवा जैसे छोटे-से कस्बे का रेलवे स्कूल…. सारे बच्चे रेलवे वालों के…. अभिभावक रेलवे में छोटे-मोटे पदों पर काम करने वाले। कुछ बच्चे आसपास के गांवों से भी आते थे, जहां शिक्षा की कोई सुविधा नहीं थी। हम सबका अंग्रेजी से कोई लेना-देना नहीं था। यह वह जमाना था, जब मध्यप्रदेश में छठवीं कक्षा से एबीसीडी की शुरुआत होती थी। मैं पहली पंक्ति में बीच में बैठता था। आधे हिस्से में लड़कियां, आधे हिस्से में लड़के। लड़कियों की तरफ से परिचय की शुरुआत हुई-
‘मास्‍साब, मेरा नाम ………सरिता कुशवाहा…….’
‘मास्‍साब, मेरा नाम………… परवीन अंसारी……’
‘मास्‍साब, मेरा नाम……….. शांति कुदेसिया……..’
‘मास्‍साब, मेरा नाम………. मीरा दुसाने……………’
फिर लड़कों का नंबर आया,
‘मास्‍साब, मेरा नाम………… दिनेश सिंह ठाकुर…….’
मैं अपनी जगह से उठ कर खड़ा ही होने वाला था कि मास्साब ने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया-
‘ न…….. न…….न………बात कुछ जमी नहीं। परिचय देने के अनेक तरीके होते हैं। अब तुम कुछ दूसरे तरीके से अपना परिचय दो। ’
मास्साब ने मुझे खड़े होने का इशारा करते हुए कहा।
‘ मुझे विनोद मसीह कहते हैं ।’ मैंने अपना परिचय कुछ दूसरी तरह से दिया, जैसा वे चाहते थे। जाटव मास्‍साब के चेहरे पर चमक आ गई। उन्होंने कहा-
‘ शाब्‍बास…….यह हुई न कुछ बात ।’
मेरे बाद रचनात्‍मकता का एक सिलसिला शुरू हुआ। शकील ने कहा था-
‘ मुझे शकील के नाम से जाना जाता है। ’
स्वरूप सिंह ने कहा था-
‘ रेलवे कॉलोनी के अखाड़े में स्वरूप सिंह पहलवान को कोई नहीं हरा सकता और वह स्वरूप सिंह मैं हूं ।’
देर तक तालियां तब बजी……. जब सबने सुना,
‘ हुजूर, शाहीन बानू आप की खिदमत में आदाब बजा लाती है।’
कक्षा छह की उम्र बचपन एवं किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ी वह उर्वर अवस्था है, जिसमें यदि सही खाद एवं पानी मिले, तो पौधा पंद्रह साल में आयु में महंगे एवं रसीले आमों से लदा वृक्ष बन जाता है। अनुकरण की तीव्र ललक, सृजनात्मकता की चाह और रचनात्मकता की खोज………. मन कल्पना के पंख लगाकर ऊंचे आसमान में उड़ने लगता है। जाटव मास्‍साब का एक वाक्य कि‍ ‘ परिचय देने के अनेक तरीके होते हैं। ‘ हम सब में एक नई चेतना जगा गया।
जाटव मास्‍साब के पढ़ाने का तरीका कुछ अलग हटकर था। जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान की सुप्रसिद्ध कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ पढ़ानी है, तो दो-तीन पीरियडों में तो न उनके हाथ में कोई पुस्‍तक है और न ही हमें अपने बस्ते में से बालभारती निकालने की इजाजत है। वे धाराप्रवाह रूप से सुभद्रा कुमारी चौहान एवं झांसी की रानी के बारे में कहानी की शैली में हमें बताते जा रहे हैं और हम सब चुपचाप सुन रहे हैं…… कोई शोर नहीं…… कोई हलचल नहीं…. बस…. मंत्रमुग्ध… ठगे हुए से। घंटी के रूप में रेल की पटरी के एक टुकड़े को बड़ी बहन जी के कमरे के सामने तार से लटका दिया गया था, जब उस पर टूटी कपलिंग के हत्थे से चपरासी नानाजी जोर से प्रहार करता, तब कहीं जाकर हमारा ध्यान भंग होता। एक पीरियड में प्रश्नोत्तरों की तैयारी करा दी जाती। कविता सबको रटा दी जाती। नींद में से उठाकर भी किसी को कहीं से भी कुछ भी पूछ लो, वह बता देगा। पता नहीं यह सब उन्‍होंने कहां से सीखा था। क्‍योंकि बी.टी.सी. या बी.एड. तो सभी शिक्षक करते हैं लेकिन कितने होते हैं, जो इस तरह पढ़ा पाते हैं। बिना डांट डपट किए, मारना तो बहुत दूर की बात हो गई, कक्षा में कठोर अनुशासन बनाए रखने का राज़ बच्‍चों के मनोविज्ञान में छि‍पा हुआ था। यह बात हमें बरसों बाद समझ में तब आई, जब उन्होंने स्वयं इस रहस्य से पर्दा उठाया। भरी कक्षा में वे जोर से बस इतना ही कहते थे,
‘भैया , हम सब देख रहे हैं’
‘ क्या हो रहा है उधर, हमें सब पता है’
‘कौन सी लड़की खुसुर-पुसुर की शुरुआत करती है, हमें पता है’
किसे कहा जा रहा है। किसी को पता नहीं चलता था। सबको लगता था कि कहीं उसे तो नहीं कहा जा रहा है। सब सतर्क एवं अनुशासित हो जाया करते थे। और वाकई में कहा किसी को भी नहीं जाता था।
‘क्या नजर है यार इस मास्साब की’ बस ग्‍यारहवीं तक हम यही सोचते रहे। बाद में पता चला कि यह सब उन्‍होंने जीवन की पाठशाला में पढ़ा था।

एक कक्षा से दूसरी कक्षा के सफर में बीच में गर्मी की छुट्टियां पड़ती थी। इस पड़ाव में बहुत से साथी पीछे छूट जाते थे। रेलवे में होने के कारण कई लोग तबादले पर चले जाते थे। गांव के लड़के फेल होने पर पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते थे। जिन लड़कियों की बचपन में ही शादी हो चुकी थी, उनका गौना हो जाता था, लिहाजा अगली जुलाई में पता चलता था कि सफर में कुछ साथी पीछे छूट गए हैं।
समय मुट्ठी से रेत की तरह फिसलता रहा। हम नौंवी में पहुंच गए। धीरे-धीरे हमें जाटव मास्साब के बारे में बहुत-सी बातें पता चल चुकी थी। अब हम उन्हें जाटव सर कहने लगे थे। पश्‍च‍िमी निमाड़ में स्थित एक छोटे से गांव के स्कूल में पढ़ने वाले ग्‍यारह वर्षीय लड़के की शादी खंडवा में रेलवे के फाटकवाले की छह वर्षीय लड़की से हो जाती है। मैट्रिक की परीक्षा पास होते ही गौना हो जाता है और पंद्रह साल की दुल्हन को लेकर लड़का खंडवा जाकर नीलकंठेश्वर महाविद्यालय में दाखिला ले लेता है और प्रारंभ हो जाता है……… जीवन के अपरिमित संघर्षों का एक अंतहीन सिलसिला। पढ़ाई एवं आजीविका के खर्च के लिए जो भी काम मिलता….. वह करता रहता था। रेलवे का वह फाटक उसके कॉलेज के नजदीक ही था, जिस पर उसके ससुर जी तैनात थे, लिहाजा वह उस फाटक की गुमठी में ही रहने लगा। सुविधा हो जाती थी। ससुर जी का खाना आता तो साथ में उसका भी खाना आ जाता था। फाटक घने जंगलों के बीच मथेला सिरे पर था। एक सुबह जब ड्यूटी समाप्त होने पर ससुर जी उसे उठाने आए तो देखा उसके साथ कंबल की गर्मी में घुसकर एक काला भुजंग नाग भी सो रहा है। वे बिना कोई आहट किए चुपचाप दूर जाकर खड़े हो गए। नाग कब निकल गया ? उन्हें पता ही नहीं चला। बी.ए.बी.टी.सी. करने के बाद मास्‍साब की नौकरी खंडवा के रेलवे स्कूल में लग गई।
हमारे समय में रेलवे स्कूल में केवल आर्ट संकाय ही था अर्थात आठवीं के पश्चात संकाय चुनना होता था, जिन्हें साइंस या कॉमर्स लेना था, वे खंडवा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में चले गए और अब रेलवे स्कूल की नौवीं में रह गए केवल सात लड़के एवं छह लड़कियां। हमारी क्‍लास प्राइवेट ट्यूशन की तरह चला करती थी। और यह वह समय था, जब हम सब जाटव सर के निकट आते चले गए। हम सब लोग सर के घर पर मार्गदर्शन हेतु भी जाने लगे थे। मार्गदर्शन के साथ बिना पेट पूजा के कभी नहीं लौटे। खंडवा के कुम्हारबेड़ा मोहल्ले में एसबेस्‍टस की छत वाले कुल तीन कमरों के छोटे-से मकान में जाटव सर अपने परिवार के साथ रहते थे। पत्नी और तीन बेटियां, राधा, गीता और मीता।
स्कूल में जाटव सर के साथ अन्य शिक्षकों का रवैया पक्षपातपूर्ण था। फिर वह कक्षाएं एवं विषयों के आबंटन का मामला हो, पदोन्नति का मामला हो या फिर बच्चों के अनुशासन से जुड़ा कोई मसला हो। लेकिन फिरंगियों के स्‍कूल की पढ़ी-लिखी हमारी बड़ी बहन जी हेडमिस्ट्रेस मिस रिबेका एडवर्ड स्कॉट के सामने किसी की कुछ नहीं चलती थी। वे सख्त़ अनुशासन बनाए रखती थी………..बच्‍चों के बीच भी और शिक्षकों के बीच भी। जब जाटव सर की पदोन्नति होनी थी तो हम ग्यारहवीं मैट्रिक में थे। उनके खिलाफ एक षडयंत्र रचकर हिंदी के मास्टर को मैट्रिक की अंग्रेजी दे दी गई। सब जानते थे कि अंग्रेजी वे पढ़ा नहीं पाएंगे। सर बड़े परेशान हुए…….लेकिन हार नहीं मानी। हमारे साथ वे भी विद्यार्थी बन गए……. यह एक अनूठा अनुभव था…..प्रयोग था। उस साल अंग्रेजी में कोई भी फेल नहीं हुआ, जबकि कुछ तो मातृभाषा हिंदी में फेल हो गए थे। मेरे तो अंग्रेजी में शत-प्रतिशत नंबर आए थे। सेवा में रहते-रहते अब तक सर तीन-चार विषयों में एम.ए. कर चुके थे। मैट्रिक के बाद मैंने नीलकंठेश्‍वर महाविद्यालय में बी.ए. में प्रवेश ले लिया। अब जाटव सर के यहां आना-जाना बढ़ गया। सर साहित्यिक प्रतिभा के धनी थे। शहर की कवि गोष्ठियों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। वैसे शालेय जीवन से ही उन्होंने मेरे अंदर के साहित्यकार को पहचान लिया था तथा वे लगातार उसे प्रेरित एवं प्रोत्साहित करते रहते थे।
धीरे-धीरे सर के व्यवहार में परिवर्तन आने लगा……..अब उनसे बात करते समय मुझे ऐसा नहीं लगता था कि मैं अपने शिक्षक से बात कर रहा हूं। कॉलेज की पढ़ाई के अलावा पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा के दौरान उनके स्वर में मित्रता के भाव अधिक रहते थे। आखिर एक दिन राधा दीदी ने कह ही दिया कि अब वे तुम्हारे शिक्षक नहीं रहे, क्योंकि तुम हमारे भाई हो। राधा दीदी मुझसे दो वर्ष बड़ी थी। जब तक मेरी पढ़ाई चलती रही, तब तक मैं खंडवा में रहा और जाटव सर के पितृत्व की छाया में पढ़ाई के अलावा पत्रकारिता भी करता रहा। एम.ए. करते ही मेरा चयन रेलवे में यातायात प्रशिक्षु के पद पर हो गया और मैं अपना पदभार ग्रहण करने इंदौर चला गया। उधर मेरे पिताजी भी रेल सेवा से निवृत्त होने के पश्चात गृह नगर नागपुर में बस गए। इंदौर से खंडवा निकट होने के कारण मैं रविवार को खंडवा ही जाता था, जब लंबी छुट्टी हो, तो घर नागपुर जाना हो पाता था। जब मैं कुम्‍हारबेड़े में घर पहुंचता, तो सर की पत्नी, श्रीमती जाटव, जिन्हें मैं मम्मी कहता था, मेरी सेवा में जुट जाया करती थी। राधा दीदी की शादी हो चुकी थी। दोनों छोटी बहनें अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती। मूली के पराठे…….. गोभी का अचार…….. मूंग का हलवा…….. दाल बाटी पर मैं टूट पड़ता था। इंदौर में होटल का खाना खाते-खाते मैं ऊब जाता था। सामने के कमरे में मैं और सर…… बीच का दरवाजा बंद हो जाता……अंदर मम्मी और छोटी बहनें अपने कामधाम, पढ़ाई आदि में व्यस्त हो जाती और हम अपनी चर्चाओं में। एक रात मैंने कहा कि-
‘ सर, इंदौर से एक लघु पत्रिका निकलती है…….विशुद्ध साहित्यिक एवं अव्यावसायिक, जिसमें आजकल मेरी लघुकथाएं छप रही हैं, ये रहे उसके दोनों अंक……. पावस एवं शरद ।’ मेरे स्वर में उत्साह था।
‘ देखो भैया ’ पहले वे मुझे विनोद कहा करते थे लेकिन जब मैं अपनी नौकरी पर खंडवा से निकल गया, तो वे प्राय: मेरा नाम नहीं लेते थे।
‘ लघु पत्रिकाओं का कोई भविष्य नहीं होता है, वे अपने स्वरूप एवं कलेवर दोनों में ही लघु होती है क्योंकि उनका आर्थिक पक्ष बहुत कमजोर होता है और किसी भी प्रकाशन के लिए अर्थ की जमीन का पुख्‍़ता होना नितांत जरूरी है। तुम्‍हारी यात्रा लघुता से विराट की ओर है ………अपने पथ से विचलित मत होना। ’ सर जब गंभीर बातें करते थे, तो उनकी आंखें स्वयंमेव बंद हो जाती थी और वे गुरु गंभीर वाणी में बहुत धीरे-धीरे बोलते थे।
उन दिनों मैं क्षणिकाएं एवं लघु कथाएं ही लिखता था। अगली बार जब आया, तो मेरे साथ अपनी कुछ ताजा क्षणिकाएं थी।उन्‍होंने क्षणिेकाओं की प्रशंसा की लेकिन कहने लगे कि –
‘ क्षणिकाओं की मारक शक्ति बड़ी जबरदस्त होती है। क्षणिका सीधे मर्म पर चोट करती है।
‘ सतसैया के दोहरे जो नाविक के तीर,
देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर ’
क्षणिका वर्षा की बूंदें हैं,जो सीप के आगोश में समाकर मोती बनती है….. चातक की प्यास बुझाती है। लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम उदात्त भावों से भरी हुई कहानियां लिखो…. समसामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक लेख लिखो।’
जब मैं पैसेंजर से खंडवा स्टेशन पर उतरता, तो पहले लालाजी की जलेबी खरीदता, तब घर जाता। रात में कभी हम स्‍टेशन के सामने वाले हलवाई की दुकान पर दूध पीने चले जाते तो मास्‍साब कहते,
‘भैया थोड़ा और देरी से आया करेंगे…….ग्‍यारह-बारह बजे…….. दूध गाढ़ा मिलता है एकदम बढ़िया । ’ सर की आवाज में युवाओं सा उत्साह होता।
‘ यार मास्‍साब, रात एक बजे आएंगे और दूध की बजाय पेड़े खाकर ही जाएंगे। ’ मैं मजाक करता। सर कब यार मास्‍साब में बदल गए, मुझे पता ही नहीं चला। जब हम दूध पीने नहीं जाते थे, तो प्रकाश टॉकीज में देर रात का शो देखने पहुंच जाते थे। पिक्चर कोई भी हो……… बेताब, खूनी रात, शराबी या फिर जलती जवानी, हमें इससे कोई मतलब नहीं होता था क्‍योंकि हम दुनिया जहान के उन सभी विषयों पर चर्चा करते थे, जिन पर दो युवा मित्र कर सकते हैं। कुछ वर्षों बाद इंदौर से प्रमोशन पर मेरा तबादला रतलाम हो गया। उस समय मोबाइल तो थे नहीं……. फोन भी आम बात नहीं थी। हमारे बीच संपर्क का एक माध्यम रेलवे फोन था लेकिन जब मैं फोन करुँ, तो मास्साब कक्षा में और जब वे फोन करें तो मैं दौरे पर। फोन पर कभी-कभी ही बात हो पाती थी। हाँ, पत्र व्यवहार होता रहता था। उनके पत्र मेरी धरोहर है, जो आज तक मेरे पास सुरक्षित है।
उन दिनों मैं अपनी बात को प्राय: बढ़ा-चढ़ा कर कहा करता था, शायद अपरिपक्‍वता थी एवं आयु की अल्हड़ता का तकाजा था। मैंने इंदौर छोड़ते समय एक लंबा पत्र उन्हें लिखा, जिसमें कुछ बातें अतिरंजनापूर्ण थी। जो शायद उन्‍हें ठीक नहीं लगी लेकिन अपने जीवन काल में शायद ही उन्होंने किसी को पीड़ा पहुंचाई हो या चोट पहुंचाने का प्रयास किया हो। उन्होंने जवाब में सिर्फ इतना लिखा-
‘ प्रिय भैया, तुम्‍हारा पत्र पढ़कर अच्छा लगा। भवानी दादा की प्रसिद्ध पंक्तियां भेज रहा हूं। बाकी तुम खुद समझदार हो।
कलम अपनी साध
और अपने मन की बात बिलकुल ठीक कह एकाध
यह कि तेरी भर न हो तो कह,
और बहते बने सादे ढंग से तो बह।
जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।
चीज ऐसी दे कि स्वाद सर चढ़ जाये
बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाये।
फल लगे ऐसे कि सुख रस, सार और समर्थ
प्राण-संचारी कि शोभा-भर न जिनका अर्थ ’
उन्‍हें पता था कि मैं एम.ए. के बाद लब्‍ध प्रतिष्ठित कवि भवानीप्रसाद मिश्र पर पी.एच-डी करने का मन बना चुका था और एक दिन हम दोनों भवानी दादा के जन्म स्थल टिगरिया जिला होशंगाबाद ( म.प्र.) भी हो आए थे। इस पत्र ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया, जो आज तक मेरे काम आ रहा है।
रतलाम से प्रतिनियुक्ति पर मैं दिल्ली चला गया। सर से पत्राचार चलता रहा। सर साहित्‍य सेवा के अलावा सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रियता से भाग लेते थे। समाज से कुरीतियां दूर करने तथा समाज के सर्वांगीण विकास के लिए पत्र-पत्रिकाओं में अपने लेखों के माध्यम से जन जागृति फैलाने के अलावा व्याख्यान आदि भी देते रहते थे। जिस प्रकार उन्होंने मुझे भवानी दादा की कविता के माध्‍यम से समझाया था कि जैसे हम हैं, वैसे ही हमें दिखना भी चाहिए। उन्होंने दोनों बेटियों गीता एवं मीता की शादी एक के बाद एक समाज के सामूहिक विवाह समारोह में कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया। राधा दीदी की शादी में तो मैंने खूब उत्‍साहपूर्वक भाग लिया था लेकिन बाद में दोनों बहनों की शादी में मैं अपनी व्यस्ततावश नहीं आ पाया था । समय पाते ही आया, तो बीमार पड़ गया। सर मुझे तुरंत खंडवा के प्रसिद्ध और बेहद पुराने डॉ. चौधरी के पास ले गए और मैं हफ्ते भर में ठीक होकर दिल्ली लौट गया।
प्रेम में असफलता प्राप्त होने पर मैंने सर को बड़ा लंबा-चौड़ा पत्र लिखा। अपनी सारी कुंठा, उदासी, पीड़ा, क्षोभ एवं खीझ अपने पत्र में उतार दी………अपने मित्र को सब कुछ बता कर मैं कुछ राहत महसूस कर रहा था कि सर का पत्र आ गया-
प्रिय भैया,
ओशो को पढ़ो। वे कहते हैं कि जिनके प्रेम सफल हो गए हैं, उनके प्रेम भी असफल हो जाते हैं। इस संसार में कोई भी चीज सफल हो ही नहीं सकती। बाहर की सभी यात्राएं असफल होने को आबद्ध है। क्यों ? जिसको तुम तलाश रहे हो बाहर, वह भीतर मौजूद है। इसलिए बाहर तुम्हें दिखाई पड़ता है और जब तुम पास पहुंचते हो खो जाता है। मृग मरीचिका है…… दूर से दिखाई पड़ता है…….।
पुस्‍तक साथ में भेज रहा हूं। अपना ख्याल रखना। जल्‍दी-जल्‍दी आते रहना। बस।
इस बार दिवाली पर लंबी छुट्टी मिल गई। दिल्‍ली से पहले खंडवा पहुंचा हालांकि दिल्ली से नागपुर सीधा रास्ता है। सबके लिए यथायोग्य उपहार लेता आया था तो देखा कि मेरे लिए शानदार चिकन का लखनवी कुर्ता पाजामा पहले से ही तैयार है। दो दिन रह कर फिर नागपुर के लिए रवाना हुआ। उन दो दिनों में खूब सारी बातें हुई। मैंने सर से कहा कि आप हमेशा मुझसे कहा करते थे कि आई.ए.एस. की परीक्षा क्यों नहीं देते ? लेकिन मैंने इस ओर कभी ध्‍यान ही नहीं दिया, हालांकि आप हमेशा मुझे प्रेरित करते रहें। अब दिल्ली जाकर तब मन हुआ है सिविल सर्विसेज की परीक्षा की तैयारी करने का जब ओवर एज होने में कुल 5 साल ही रह गए हैं। खैर, मैं तैयारी में जुट गया। कोचिंग में भी प्रवेश ले लिया। सुना था कि दिल्‍ली की कोचिंग सबसे बढि़या होती है। कभी प्रीलिम्‍स में फेल तो कभी मेन में तो कभी इंटरव्यू में…… इसी तरह दो चांस बीत गए….. मैं निराश हो गया लेकिन सर के पत्र धीरज बंधाते रहते थे। पाँच साल तक न तो मैं खंडवा गया और न ही नागपुर। मैंने भी ठान लिया था कि कुछ कर दिखाना है। अब मोबाइल फोन आ चुके थे ……इंटरनेट था लिहाजा सर से संपर्क जल्दी-जल्दी होता था। अब ओवर एज होने में दो साल बाकी थे।
एक दिन अचानक सुबह पांच बजे घबराए हुए स्वर में मम्मी का फोन आया-
‘ बेटा ! पता नहीं पापा को क्या हो गया है ? उठ नहीं पा रहे हैं, मुंह टेढ़ा हो गया है, मुंह से लार बह रही है, शरीर कठोर होता जा रहा है ’
मैं समझ गया सर को पैरेलिसिस का दौरा पड़ा है। मैंने तुरंत राधा दीदी के पति आकाश जीजाजी को फोन किया, जो अब तबादले पर खंडवा आ चुके थे। खंडवा में दो दिन के इलाज के बाद उन्हें इंदौर शिफ्ट कर दिया गया। सिविल सर्विसेज की परीक्षा का फॉर्म भरने की औपचारिकताओं के चलते मैं नहीं जा पाया लेकिन एक महीने अस्‍पताल में भर्ती रहने के बाद जब वे खंडवा आ गए, तब मैं पहुंचा। जब मैं पहुंचा तो वे कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने मुझे देखते ही अपने बाएं हाथ से मुझे पकड़ा और अपने गले से लगा लिया और बेतहाशा रोने लगे।
‘ भैया…..तुम्‍हें……. देखना था…..इसलिए बच गया। ’ मैं नि:शब्द…. कुछ भी कहते नहीं बना….. शब्द जैसे मुंह में दही बनकर जम गए थे। ऐसे समय जब शब्‍द बाहर नहीं निकलते, तो भावनाओं का उद्रेक तो कहीं न कहीं से फूटेगा ही, लिहाजा मेरी रुलाई फूट पड़ी, फिर पता नहीं हम कितनी देर तक रोते रहे। आंसुओं के निर्मल प्रवाह में मेरी यात्रा की सारी थकान और सर की सारी उदासी बह गई। अब वे काफी राहत महसूस कर रहे थे।
मैंने अपने जीवन में कई पत्नियों को देखा है, जिनकी पति सेवा का उदाहरण गाहे-बगाहे सबको दिया जाता है लेकिन मैंने मम्मी जैसी महिला नहीं देखी, जिनका जीवन ही पति की सेवा के लिए बना था। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही अपने व्‍यक्तित्‍व को भुलाकर सर की सुख-सुविधा का ध्यान रखना था……. उनके व्यक्तित्व में घुल-मिल जाना था। यह मैंने तब देखा था, जब सर पूरी तरह से स्वस्थ थे, नौकरी पर थे और अब तो बात ही निराली थी। मुझे अड़ोसी-पड़ोसी बताया करते थे कि मम्मी की सुबह, दोपहर, शाम मास्‍साब के साथ होती है। वे उनकी पत्नी है….. मां है….. बहन है….. आया है…..महरी है…… बरौनी है……महराजिन है….धोबन है…. नर्स है…. लाठी है….. धूप है…. छांव है…. यानि सब कुछ है। यह मम्मी की अथक सेवा का परिणाम ही था कि जिनके बारे में लोग कहते थे कि अब तो मास्‍साब बिस्तर से कभी उठ नहीं पायेंगे, वे मास्‍साब एक साल में बिना किसी सहारे के चलने फिरने लगे।
जब मैंने मेन पास कर लिया तो किसी को नहीं बताया। मिठाई लेकर सीधा खंडवा पहुंचा। देखा घर के आंगन में मास्‍साब बिना किसी सहारे के अकेले ही टहल रहे हैं। उन्‍होंने मुझे देख लिया था…… पर शायद पहचाना नहीं क्‍योकि हम दोनों में काफी परिवर्तन आ चुका था। वे बहुत अधिक दुबला गए थे तो मैं बहुत अधिक मुटा गया था। फाटक खोल सीधा उनके सामने जाकर खड़ा हो गया। उन्होंने मुझे देखा और कहा-
‘ कौन ? कौन है भाई ? अरे ! मेरे विनोद भैया ’
…….और मुझे गले लगा कर जोर-जोर से रोने लगे, इतनी जोर से कि किसी अनहोनी की आशंका से सारे पड़ोसी हमारे आंगन की ओर दौड़ पड़े। रिक्शा वाले ने, जो अब तक पैसों के लिए वहीं खड़ा था, यह कहकर माहौल को हल्का बना दिया कि बाबू जी, राम भरत मिलाप पूरा हो गया हो, तो मुझे किराए का पैसा दे दो, मैं चला जाऊं। खूब जी भरकर बातें हुई। बातों-बातों में ही इंटरव्यू के लिए मेरी तैयारी हो गई। मैं एक सप्‍ताह रहकर नागपुर चला गया।
इंटरव्यू ठीक-ठाक रहा। मुझे सफलता मिल गई। आई.ए.एस. तो नहीं बन पाया, क्योंकि नंबर कम पड़ गए। मुझे भारतीय रेल यातायात सेवा आबंटित की गई। मैं रेलवे के परिचालन (यातायात) विभाग में ही कार्यरत था और विभागीय परीक्षा पास कर क्लास 2 के सहायक परिचालन प्रबंधक के पद पर तैनात था। इस पद पर रहते हुए मैं सेवानिवृत्ति तक वरिष्ठ मंडल परिचालन प्रबंधक के पद तक ही पहुंच सकता था। मुझे अपने वर्तमान पद से तकनीकी रूप से इस्तीफा देना पड़ा, उसके पश्‍चात मेरी तैनाती सीधी भर्ती वाले क्लास 1 सहायक वाणिज्य प्रबंधक के पद पर हो गई और मैं प्रशिक्षण हेतु रेलवे स्टाफ कॉलेज ,वडोदरा रवाना हो गया। मेरी प्रसन्‍नता की तो कोई सीमा ही नहीं थी क्योंकि अब मैं महाप्रबंधक स्तर के सर्वोच्च पद पर भी पहुंच सकता था। जब मेरी तैनाती नागपुर में थी तो मैं दिल्ली जाते हुए एक दिन इटारसी में रुककर कुछ समय के लिए खंडवा पहुंचा। काफी लंबा अंतराल बीत चुका था। इस बार सर को मुझे पहचानने में देर नहीं लगी। गले लगा कर रोने लगे। जितनी देर तक मैं रहा मैंने महसूस किया कि अब सर बात-बात में बहुत ही ज्यादा भावुक हो जाते हैं। रह-रहकर उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। बात खुशी की हो दुख की, उनका मन करुणा से भर उठता है। अब मुझसे मित्रवत व्यवहार नहीं करते। कोई चुटकुला नहीं सुनाते और न ही किसी प्रकार का हंसी मजाक करते हैं। मुझसे फिल्मी कलाकारों की मिमिक्री करने की मांग भी नहीं करते।
इस बार जब मैंने मास्‍साब से विदा ली, तो मन कुछ उदास था। पता नहीं यह आशंका मन में क्यों बार-बार घर कर रही थी कि जब मैं अगली बार आऊंगा तो शायद मुझे इससे खराब स्थिति का सामना करना पड़ेगा। शरीर से तो वे टूट ही चुके थे, लेकिन व्यक्ति पूरी तरह से टूटता तब है, जब वह मन से टूट जाता है। मन के दरकने का कुछ-कुछ एहसास लेकर मैं पंजाब मेल से दिल्ली रवाना हो गया।
समय की नदी जीवन के कूल-किनारों-कछारों से टकराती आगे बढ़ रही थी। उन दिनों मैं मुंबई में पदस्थ था। एक दिन मम्‍मी का फोन आया-
‘ बेटा, पापा को पता नहीं कौन-सा रोग हो गया है ? शायद बुढ़ापा है। कुछ याद नहीं रहता। अब तो कभी-कभी मुझे भी नहीं पहचानते। खाना रख दो, तो खा लेते हैं ।’ सुनकर मैं सातवें आसमान से गिर पड़ा।
‘ अरे ! ऐसा कैसे हो गया ? ’ मैं चिंता के सागर में डूब गया। मुझे लगा, कहीं डिमेंशिया ( मनोभ्रंश ) की शुरुआत तो नहीं ?
‘ क्या बताएं ? तुम्हें तो कई बार फोन किया, फोन ही नहीं लगता तुम्‍हारा। ’ मम्मी की आवाज में मुझे किसी हारे हुए सिपाही का दर्द महसूस हो रहा था, जबकि पहले वे हमेशा विजयी मुद्रा में रहती थी और यह उनकी आवाज से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता था। अपराध बोध से मेरी आवाज रुंध गई क्योंकि क्लास वन अफसर बनने के बाद मेरा फोन नंबर बदल गया था और पुराने सिम से कुछ नंबर भी निकल गए थे, उनमें शायद मास्‍साब का नंबर भी था।
‘ क्‍या ये अचानक हो गया ? ’ मैं बड़ी मुश्किल से ही कह पाया था।
‘ नहीं…..पहले किसी का फोन नंबर भूल जाते थे…….. तो बहुत याद करने पर भी याद नहीं आता था। आज कौन सी तारीख है ? दस बार पूछते थे। कुछ दिन बीते, अखबार पढ़ने के बाद कहते थे कि क्या आज अखबार नहीं आया ? फिर कुछ दिनों बाद यह स्थिति हो गई कि खाना खाने के बाद पूछते थे कि आज खाना नहीं खाना क्या ? बाद में तो गुमसुम से रहने लगे । किसी से भी बात नहीं करते थे। कारण हमें बहुत दिनों के बाद पता चला, जब तुम्‍हारे जीजाजी मास्‍साब को बड़े डॉक्‍टर साहब के पास भोपाल लेकर गए। भोपाल के बड़े डॉक्‍टर साहब ने बताया कि वे अब किसी को भी नहीं पहचानते, इसलिए गुमसुम रहते हैं। उनकी बीमारी आखिरी स्‍टेज पर है। अब मैंने घर के काम के लिए महरी, महराजिन और धोबन रख ली है। पूरे समय इनके पास बैठी या लेटी रहती हूं। लेकिन अब मु..झे भी न…ही प..ह..चा..न..ते । ’ सिसकियां धीरे-धीरे करुण क्रंदन में बदल गई। मैं अंदर तक कांप गया। इतना ही कह पाया-
‘ कल सुबह पहुंच रहा हूं। ’
सर्दियों के दिन थे। सुबह की गुनगुनी धूप में मास्‍साब को कुर्सी पर बैठाया गया था। मम्‍मी पास ही दरी पर बैठकर कुछ बीन रही थी। मैंने फाटक पर पहुंचकर धीरे से आवाज दी-
‘ मम्मी ’
‘ अरे वाह ! आ गए बेटा। आंखों में अचानक भर आए आंसुओं को पल्‍लू से पोंछते हुए मम्‍मी लगभग दौड़ते हुए फाटक तक आई, फिर तेजी से घर के अंदर चली गई। मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि यह हो क्‍या रहा है ? फिर चाबी से फाटक पर लटका बड़ा-सा ताला खोलती हुई बोली-
‘ पूरे समय फाटक पर ताला लगा कर रखती हूं…….एक दिन निकल गए थे… जान पर बन आई थी । ’
जाटव मास्‍साब एकटक आंगन में खिले गुलाब के फूल की ओर अपलक देखे जा रहे थे। पता नहीं गुलाब में किसका अक़्स खोज रहे थे ? ………..संपूर्ण घटनाक्रम से एकदम अनजान बने हुए। मैंने धीरे से झुककर आहिस्‍ता से उनके पैरों को छुआ……. जैसे ही उन्‍हें छुअन का एहसास हुआ….. उन्होंने तेजी से पलटकर मेरी ओर देखा….. बस कुछ क्षणों के लिए…..और दोनों हाथ फैला कर मुझे अपने आगोश में भर लिया। मेरे कानों में जैसे किसी गहरी अंधेरी सुरंग से निकलती हुई धीमी-सी आवाज आ रही थी-
‘ वि…..नो…..द…. भै….या ’
…….
उप महाप्रबंधक ( राजभाषा ),
मध्‍य रेल मुख्‍यालय, मुंबई

11 COMMENTS

    • बेहद मार्मिक । इस तरह के किरदार हमारे आसपास के ही तो होते हैं । कहानियां भी जीवन से ही उठाई जाती हैं । माँ वैसे तो प्रथम गुरु होती हैं लेकिन प्रथम गुरु भी माँ से किसी मायने में कमतर नहीं होते । वही आत्मीयता , वही अपनत्व , वही सब कुछ । माँ जैसा ही ।

  1. शायद वास्तविक घटना प्रतीत होती है बहुत सुंदर शब्दों में व्यक्त हुई है

  2. बहुत सुंदर कहानी। वास्तव में रिश्ते केवल पारिवारिक ही नहीं होते। जीवन के बहुत बड़े कैनवास पर फैली चित्रात्मकता की अद्भुत मिसाल है। विपिन कुमार ‌ बहुत बधाई के पात्र हैं। यह तो उपन्यास भी बन सकती है।

    • साहित्यिक दृष्टि से बहुत प्रभावशाली कहानी है । सम्पूर्ण कथानक ऐसे लगता है जैसे आंखों के सामने घटित हो रहा हो । अभाव, दुख व गरीबी से बीच से निकली हुई संघर्षरत दो धारायें जैसे साथ साथ बह रहीं हों । गुरु और शिष्य की परम्परा व परस्पर प्रेम का सजीव व यथार्थ चित्रण । लेखक विपिन पवार जी को बहुत बहुत साधुवाद व बधाई ।

  3. बहुत सुन्दर बृहद् कहानी। संबंधों की भावना को चित्रित करती ,अंतरंगता उड़ेलती कहानी। लेखक विपिन पवार जी सचमुच बधाई के पात्र हैं।शुभकामनाओं सहित

  4. उफ़्फ़फ़ कितनी बार आंख नम हुई,रोंगटे खड़े हो गए,🙏🙏ग़ज़ब मार्मिक कहानी🙏🙏

  5. सर जी आपकी इस वास्तविक कहानी मे मास्टर जी का पढ़ाने और विद्यार्थियों का परिचय कराने का तरीका बहुत ही सुंदर था। कहानी के माध्यम से हमारे साथ शेयर करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

  6. बेहद सुंदर कहानी। कहानी पढ़ते-पढ़ते आंखों के आगे सभी घटनाओं और किरदारों का चित्र सा खिंच जाता है.
    विपिन पंवार सर को हार्दिक बधाई

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