काव्य भाषा : यादें भुलाना भी जरूरी – विनीत मोहन ‘फिक्र’ सागरी सागर

ग़ज़ल

गुजश्तः वक्त की यादें भुलाना भी जरूरी है।।
छलक आयें अगर आँसू छुपाना भी जरूरी है।।

शिकायत हो तगाफुल की अना की शोख नखरों की
सितम उनके मगर सिर पे उठाना भी जरूरी है।।

हजारों गम सहो औ जुल्म भी दौरे मुहब्बत में
कि इस दीवानगी में दिल जलाना भी जरूरी है।।

करें जो झूठ को सच तो कभी हैरान मत होना
हसीनों के लिए आखिर बहाना भी जरूरी है।।

कभी हालात के आगे न बदलो रंग फितरत का
बनाते हो अगर रिश्ता निभाना भी जरूरी है।।

न हो मुमकिन भले ही वस्ल की सूरत कभी साकी
नज़र के तीर चिलमन से चलाना भी जरूरी है।।

कहो मत ‘फिक्र’ कुछ भी दर्द गर हद पार कर जाये
कि जख्मी दिल पे छाले तो सजाना भी जरूरी है।।

पूर्णतः मौलिक एवं स्वरचित

विनीत मोहन – ‘फिक्र’ सागरी
सागर, मध्य प्रदेश