काव्य भाषा : सावन मनभाऊ -शंकर सिंह सिदार

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सावन-मनभावन

1)सावन जी मनभावन लागे,
चले सनन-सनन पुरवाई है।
देखो किसान हल के साथ,
मेहनत खूब रंग लाई है ।
हरा भरा चहूँ,ओर लगत है‌,
खेत-खार हरियाई है ।।
सावन जी मनभावन लागे।
चले सनन-सनन पुरवाई है ।।

2) रिमझिम बारिश की ये बूंदें,
सबके बदन भिगाई है।
तन-मन हो रहा प्रफुल्लित,
खुशी हृदय में समाई है।
पक्षियों की मधुरिम कलरव,
सबके मन को भायी है ।।
सावन जी मनभावन लागे।।
चले सनन-सनन पुरवाई है।

3)प्रीत जगाते,स्नेह बढ़ाये,
अद्भुत प्रेम जगाई है।
मोर अपना पंख पसारे,
पावस पास बुलाई है ।।
पिया मिलन को मन तरसे,
रिमझिम फुहारें ‌आई है ।।
सावन जी मनभावन लागे ।।
चले सनन-सनन पुरवाई है।।
शंकर सिंह सिदार

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