कहानी : बूंद-बूंद से बरसे – शशि दीपक कपूर मुम्बई

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    “बूँद-बूँद से बरसे” कहानी जीवन के उन प्रतिपल घटते क्षणों को आकार देती है, जिसमें हर व्यक्ति अपनी-अपनी स्थिति के अनुरुप ढालता है और उसी राह पर चलता है । खुली आँख से चले या आँख मूँदकर चले , दोनों रास्ते उसे स्वयं ही समय-असमय बुलाते हैं। “

कहानी

बूँद-बूँद से बरसे

स्याह-रात-सी उठन, घुटन नसों में ऐसी ऐंठन भर देती कि अब लगता नहीं परायी है । अपनी ही लगती है । कभी बिल्कुल पैरों के नीचे दबे-बिछे नकाशीदार ग़लीचों की तरह, कभी घर के बाहर दूर तक फैली काली सड़क की तरह । सड़क दिन-रात वाहनों के संग चलती है । स्याह-रात पंद्रह दिन बाद चाँदनी-सी खिल जाती है । मैं अपने जीवन के इस पन्द्रह दिन वाले पहाड़े को पिछले कई वर्षों से गहरी एकाग्रता से पढ़ता चल रहा हूँ । बेमतलबी बातों को मिटाता चला जा रहा हूँ ।

देखो, सूरज मेरे घर के सामने चमकता है । पूरब से चलकर साँझ में ग़ायब हो जाता है । मैं सूरज के साथ नित चलता हूँ, पर ग़ायब नहीं होता । वह अपनी ज़मीं पर है । मैं अपनी ज़मीं पर हूँ । होगा! वह औरों के लिए आकाश, नभ, गगन और आसमान …मेरे लिए…वह एक टुकड़ा-भर है । जो मेरे ही सिर पर समय को साथ लेकर मँडराता रहता है । जोश से भरा हुआ कहने से कभी मैं डरता भी नहीं कि मैं अकेला हूँ ।

अपनी धमनियों के उतार-चढ़ाव को गिन सकता हूँ । कोई चिंता भी नहीं है मुझे । होगी भी क्यों ? पैसा है । बंगला है । गाड़ी है । फिर और क्या चाहिए मुझे…! अपने मन का मालिक हूँ । अपनी कंपनी का बॉस हूँ ।

हाँ , बॉस हूँ …। कल का पता नहीं ? बस, जो कुछ भी हूं , आज हूं । अब के लिए हूँ । इसके सिवाय कुछ भी नहीं हूँ …।

नयी सुबह हुई । मैं सूरज की तरह धीरें-धीरे बिस्तर से उठ चलने लगा । टूथपेस्ट करते-करते अपने चेहरे को शीशे में देख गर्व महसूस हुआ , “ मेरा चेहरा हुबहू पिताजी जैसा है ।”

अपने होंठों पर हल्की मुस्कान डूबता चला गया – माँ की झिड़कियों में, “ अरे तू, अपने बाप की तरह ही ज़िद्दी है । हर चीज़ में आना-कानी करता है । कभी तो बिना नुकताचीनी किए दो ग्रास रोटी के खा लिया कर…। “

मैं पैदाइशी ही खाना खाने में अधिक चूज़ी हूँ । बचपन से गाँव में रहते तक बिना नानुक्कड़ के मैंने कभी भोजन किया हो, मुझे याद नहीं ।…माँ के स्वर में कितना लाड-प्यार छिपा था । तौलिए मुहं पोंछते हुए खिड़की से बाहर ताकने लगता हूँ । और मन ही मन बाबूजी व माँ को प्रणाम व उनसे आशीर्वाद माँगता हूँ । मुझे सूरज की किरणों में एक किरण बाबूजी व माँ से आती सी अकसर दिखाई देती है । अगले ही पल , इलेक्ट्रिक चाय के बरतन में चाय बनाकर कप में उलेड़ , साथ में नमकीन व मीठे बिस्किट लेना कभी नहीं भूलता । चाय की एक-एक चुसकी से आनंद लेते हुए टीवी पर न्यूज़ देखना, चाय पीकर फिर लॉन में टहलना, टहलते हुए गौरयों के झुरमुट देखना और चिड़ियों चहचहाना, कौओं का इधर से उधर चिल्लाते हुए उड़ना, पालतू बिल्लियों व कुत्तों को सैर पर ले जाते लोगों को देखना …वग़ैरह वग़ैरह के साथ-साथ दूध वाले और नारियल पानी वाले, ब्रेडअंडे-पाव वाले, अख़बार वालों आदि के मेहनती चेहरे देख एक नई ऊर्जा से अनायास ही भर जाता हूँ ।
सोच, मैं डूबा ही था, आज न जाने क्यों माँ-बाबूजी की याद बार-बार आ रही थी । नज़र सामने लगे कैलंडर पर जा रुकी । तारीख़ ने मुझे अगाह किया कि आज ही के दिन दोनों ने एक-साथ घर-संसार को अलविदा कह दिया था । आँखों में आँसू बूँद-बूँद बरसने लगे । स्मरण होने लगे बीते दिन फ़्लैश बैक की भाँति । कभी आँगन में माँ की गोद में ख़ुद को पाता तो कभी उनका पल्लू पकड़ कर खींचते हुए ज़िद्दी करता । बाबू जी के हाथों बैत से पड़ी मार की टीस पुन: जीवित हो उठी पीठ पर । और उनके साथ बाज़ार व मेले में घूमने के दिन भी मन में भाँति-भाँति की खमोंचों की आवाज़ें सुनने लगे ।
जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा था, मैं भी उसी के साथ-अपनी दिनचर्या में घुलता-ढुकता जा रहा था । अंतर्मन से यादों से पीछा न करने का मेरा प्रयास ऑफ़िस के गेट पर पहुँचकर लुप्त हो गया । यहाँ से मेरे निज इच्छा की यात्रा का आरंभ भी हो गया । दरवाज़े को वॉचमेन ने अपनी ओर धकेला , मैं एयरकंडिशनर ऑफ़िस के कमरे पर रॉयल नीली कुर्सी पर बैठ गया । टेबल पर पड़ी फ़ाइलों के पन्ने उलट-पुलट करने में व्यस्त हो गया । सेक्रेटरी को बुलाया और दिन भर की मीटिंगस की जानकारी ली ।
सेक्रेटरी को आनन-फ़ानन में हिदायत दे दी , “ जॉनपॉल कंपनी की मीटिंग कैंसल कर दो और उनसे कह दो कि हम अपना मॉल आपको समय पर नहीं सप्लाई कर सकेंगे, इसलिए यह डील रद्द ही समझें। साथ में, यह भी कह दिया सेक्रेटरी से भविष्य में ओर नये सप्लायर्स से कॉन्टेक्स्ट न लिए जाएँ । “
उसने मेरी दी गई हिदायतों को ग़ौर से सुना । और शायद वह इस बारे में कुछ पूछना चाहती थी । कुछ पल रुकी भी । फिर न जाने उसने मेरे चेहरे पर से कौन-सी इबारत पढ़ ली । ठक से कुर्सी से उठी, मुड़ी और दरवाज़े को ज़ोर से धकेलकर रिसेप्शन कांउटर के पास चली गयी । उसका यह अंदाज मुझे कुछ मिसबिहेवीयर-सा लगा । यह तो मैं ही जानता था कि कब नये सप्लार्यज को अपनी कंपनी से जोड़ना है । मेरे अकेले के लिए काफ़ी थी यह धन-दौलत । यह निश्चय ! …आज सुबह माँ-बाबूजी को याद करते समय ही कर लिया था ।
एक के बाद एक फ़ोन अटैन्ड करते-करते , हाँ…ना…गुडमॉर्निंग, गुडऑफ्टर नून,थैंक्यू ,सॉरी आदि ढेरों वाक्यों, शब्दों के ताने-बाने में ढलते समय ने कहलवाया गुडइवनिंग..। यह सब मेरे लिये रोज़ की एक सामान्य क्रिया थी ।
दिन ढलते-ढलते एक फ़ोन आया, जिसे मैं अटैन्ड नहीं करना चाहता था । मगर रिसेप्निशट के बार-बार के आग्रह करने पर मैंने फ़ोन पर बात करनी शुरु की । पता चला, यह फ़ोन मेरे घनिष्ठ मित्र सुब्बीर का है ।
“ मेरी तबीयत ठीक नहीं है। मंजू अपने काम से सेमिनार अटैन्ड करने शिमला गई हुई है । दोनों बच्चों को नानी के घर छोड़ गई है । घर पर मैं अकेला हूँ । नौकरानी भी मंजू के आने पर ही आएगी । तुम्हारे सिवाय ओर कोई रिश्तेदार नज़दीक नहीं रहता है, तुम तो जानते ही हो …प्लीज़, यार, सब कुछ छोड़कर ज़रा जल्दी आ जाओ।”
मैंने उसे कहा, “मुझे तुम्हारे घर पर पहुँचने में एक-डेढ़ घंटा लग जाएगा । अगर तुम्हारी तबीयत ख़राब है तो मैं डॉक्टर सिन्हा को तुम्हारे यहाँ भेज देता हूँ । “
“ नहीं…नहीं…, बस, तुम जल्दी से जल्दी यहाँ आ जाओ।”
मुझे भी उस समय शायद उसकी आवाज ध्यान से न सुनने के कारण रोगी जैसे लक्षण कोई नहीं सुनाई पड़े ।
और फ़ोन रखते हुए मैं मन ही मन बुदबुदाया, “ साले को ! आज बीयर टुन नाक तक पीनी होगी। “
ऑफ़िस से निकल अपनी गाड़ी की ओर तेज़ क़दमों से बढ़ने लगा । ट्रैफिक से बच-बचकर निकल जाने के रास्ते सोचने लगा । किन्हीं-किन्हीं जगहों से गाड़ी छोटी गलियों से निकाल से सुब्बीर को बताए समय से पहले ही उसके घर जा पहुँचा । डोर बैल बजते ही, सुब्बीर ने दरवाजा खोला । उसका पीला दर्द चेहरा देख हाथ पैर फ़ुल गए, आँखें बर्फनुमा गोले-सी हो गई । तुरंत ख़ुद को संभालते हुए पहले उसे हल्की डॉट लगाई, फिर उसे तुरंत अस्पताल चलने को कहा ।
उसने अपना हाथ मेरे हाथ रख खींचते हुए , सहारा लेकर चलते हुए सामने सोफ़े पर मुझे विठा दिया और ख़ुद भी मेरी जाँघों पर सिर रख दिया ।
उसके सिर को सहलाते हुए कहा,“ चलो उठो , तुम्हें यहाँ के बड़े अस्पताल ले चलता हूँ, तुम ठीक हो जाओगे । “
धीमी आवाज से बोला, नहीं …नहीं…, यही कोई दो घंटे पहले अस्पताल से ही डिस्चार्ज होकर घर आया हूँ । देखो, सामने के शो-केस पर फ़ाइल पड़ी है ।”
“तुमने मंजू को यह सब बताया है या नहीं …।” उसकी बात को बीच में ही काटते हुए पूछा ।
नहीं…, इसकी कोई जरुरत नहीं समझी,यार । एक ठंडी आह भर, चुप हो गया।
कॉलेज के दिनों से ही, मैं दोनों की लव-केमिस्ट्री से वाक़िफ़ था । दोंनों ने अपनी-अपनी पढ़ाई पूरी करने के दो साल बाद विवाह किया था । एक जाति और एक धर्म का होने के कारण किसी प्रकार की रुकावट नहीं आई थी । वैसे भी, प्रेम की डगर पर विरले ही परवान चढ़ते है। सब के भाग्य में प्रेम-रेखा कहाँ होती है ? अगर होती भी है तो अधूरी ।…
उसका सिर कुशन पर रखते हुए पूछा, “ क्या तुम्हारी फ़ाइल देख सकता हूँ और क्या डॉ. सिन्हा को इसकी जानकारी दे दूँ ।”
सुब्बीर को शायद दवाईंयों या कमजोर होने की वजह से बात करते-करते बीच-बीच में नींद आ रही थी । उसने अपना सिर हिलाकर ‘हाँ ‘ की स्वीकृति दी ।
बिना एक क्षण गँवाएँ , मैंने डॉ सिन्हा को सुब्बीर की सेहत के बारे में बताते हुए , जल्दी से जल्दी सुब्बीर के घर आने को कहा । अच्छा हुआ , डॉ सिन्हा सुब्बीर के घर आने को राज़ी हो गये ।
जब तक डॉ सिन्हा यहाँ पहुँचते, मैं सुब्बीर के सूखे होंठों और कभी तेज़ होते श्वास और कभी धीमें छुटते श्वासों के उतार-चढ़ाव को देख घबराते हुए अशुभता को अनुभव करता । ज़िंदगी में कभी किसी को इतना बीमार जो नहीं देखा था । सोच रहा था, ऐसा क्या करुं, कम से कम इसके इतने रुखे श्वासों को कुछ पल ओर रोक सकूँ । बचपन का एक यही तो मित्र है । अचानक माँ की कही बात स्मरण हो आई, जब मुझे तेज़ बुखार हुआ था, शायद पीलिया भी, तब माँ ने मुझे दवाईयों के साथ-साथ एक-एक बूँद पानी की चम्मच से लगातार पिलाती रहती थी ।
मैंने सुब्बीर को हिलाया और उसके हुँ..हुँ की आवाज सुन कहा, “मैं तुम्हें चम्मच से एक-एक बूँद गूल्कोस का पानी पिलाता हूँ, तुम पीते रहना ।”
सकी हुँ..हुँ..हुं सुन, चम्मच से एक-एक बूँद पानी पिलाने लगा । तक़रीबन आधे घंटे बाद डॉ सिन्हा यहाँ पहुँच गये । पहले उन्होंने सुब्बीर के आँखों की पलकें उठाकर पुतलियों की स्थिति जाँच की, फिर शेष नब्ज, हार्ट बीट की । फ़ाइल में लगी सारी रिपोर्टस पढ़ी । शो-केस पर पड़ी एक-एक दवाईयों को भली-भाँति देखा ।
मेरी ओर गंभीर नज़रों से देखते हुए कहा, “क्या तुम इसे मेरे हॉस्पिटल में तुरंत एडमिट कर सकते हो । “
मैंने कहा , सुब्बीर , अब कहीं भी जाना नहीं चाहता है । वह मेरे साथ ही अपना हर पल बीताना चाहता है ।”
डॉ सिन्हा ने कहा, ऐसी अवस्था में पेशंट यही कहता है, पढ़े-लिखे हो, थोड़ा सोच का दायरा उम्मीदों से भरा रखो । अभी मैं एक इन्जेक्शन दे देता हूँ । इससे सुब्बीर को नींद आ जाएगी, बैचेनी भी कम महसूस होगी । ठीक है, एम्बुलेंस भिजवा देता हूं । स्थिति तो बेहद नाज़ुक है । ठीक भी हो गया तो क्या कम है ! अगर दो-चार साल ओर जी जाए ।“
स्तब्ध-सा हो सुब्बीर के चेहरे को देखने लगा । और डॉ सिन्हा के सुझाव को मान गया ।
रातभर सुब्बीर का डॉ सिन्हा अपनी देखरेख में इलाज करते रहे । मैं अतीत के पन्ने उखाड़ने लगा । जब इस शहर में, नया-नया आया था , यह कोई दस-बाहर साल पहले । सुब्बीर व मेरी नौकरी एक साथ एक ही कंपनी में लगी थी । इतने सालों में बीयर पीने के हम दोनों ही शौक़ीन हो चुके थे । शुरु में मुझे बीयर न पचती थी । पहली बार जब सुब्बीर ने बीयर पिलायी थी तब मेरी तबीयत बिगड़ गई । वह मुझे डॉ सिन्हा की क्लीनिक में ले आया था ।
डॉ सिन्हा ने डाँट लगाते हुए कहा था, ” बरखुदार, जो चीज़ पचा नहीं सकते , उसे पीते ही क्यूँ हो ? आजकल के जवान बच्चों को बड़ी तलब रहती है…हाई-फ़ाई सोसयटी मेन्टेन करने की । अब इन्हें नक़ल में अकल लगाना कौन सिखाए ? …शहरों में आते ही, गाँव के लड़कों को न जाने कौन-से पंख लग जाते हैं …माँ-बाप के संस्कार, परवरिश सब कुछ भूल जाते हैं । कम से कम सिगरेट शराब के व्यसनी तो न बने…ये क्या जानेंगे माँ-बाप के दु:ख संघर्ष को ! सोच की उड़ान शहर की इमारतों से ऊँची है, वहाँ तक पहुँच पाना, सबके बस की बात कहाँ है ? “ उस दिन इतना बड़ा लेक्चर दिया था । आज एक शब्द भी नहीं कहा ।
सुब्बीर पूरी रात कहराता रहा । मैं बेसब्री से नये दिन का इंतज़ार कर रहा था । शंकाओं-आशंकाओं के दायरे कभी सिरहन देते, कभी सांत्वना । अस्पताल की खिड़की के शीशे से अब अंधेरा छँटने लगा था, मेरी अध-खुली नींद से भरी आँखें आज मंजू को तलाशने लगीं । सवालों के जवाब ढूँढने लगीं ।
मेरे पहले प्यार को दृढ़ता से यह कह कर उसने ठुकरा दिया था कि , “ मैं सुब्बीर से प्यार करती हूँ । “ मैंने इस वाक्य को ज्यों का त्यों अपने ज़हन में उतार लिया । फिर कभी हिम्मत ही नहीं हुई किसी से प्रेम कर सकूँ । हाँ, आज तक नहीं !…”
पक्षियों के उड़ने-चहचहाने की आवाज़ें ज़ोर पकड़ने लगीं । मंदिरों की घंटियाँ बजने लगीं । गुरुद्वारे में शबद गूँजने लगे । मस्जिद से अरजान आने लगी । गली-गली चहल-पहल में बदलने लगी । उदास मन को मैं चाय की चुस्की में डुबोने अस्पताल से बाहर चला आया । मन का व्यथित होना स्वाभाविक था । ऐसा क्या हो गया सुब्बीर और मंजू के बीच , जो सुब्बीर अपने बीमार होने की ख़बर तक मंजू को देना नहीं चाहता । अगले ही पल स्वयं को संभालने का प्रयत्न करने लगा । क्यूँ मैं पति-पत्नी के बीच स्वयं को एक कील-सा ठोकते जा रहा हूँ ? चाय पी, मेरे पाँव मंदिर, गुरुद्वारे और मस्जिद सीढ़ियों पर बारी-बारी से जा रुके । और हाथ जोड़ कर सुब्बीर के जल्दी स्वस्थ होने की कामना करने लगे ।
फिर अस्पताल पहुँचकर डॉ सिन्हा के आने का इंतज़ार करने लगा ।
थोड़ी देर में, डॉ सिन्हा आए । उन्होंने सुब्बीर को चेक किया, नर्स से कुछ प्रश्न पूछे । फिर मेरी ओर मुड़े, कहने लगे, “ सुब्बीर को सात-आठ दिन तक अस्पताल में रखना होगा । ठीक हो जाएगा । “ इतना बताकर डॉ सिन्हा दूसरे मरीज़ को देखने लगे ।
मैंने नर्स से पूछा , “क्या मैं दो तीन घंटों के लिए घर जा सकता हूँ ।”
उसने हाँ कर दी और कहा , “ इससे ज़्यादा लेट मत होना ।”
तेज़ क़दमों से पल-भर में लाँघ ऑटो-रिक्शा से अपने घर आ गया । नहा-धो ताजगी भरे लहजे में सेक्रेटरी को इ-मेल से संदेश दिया कि आज ऑफ़िस नहीं आ रहा हूँ । सारी मीटिंग्स तीन-चार दिन बाद की कर दो ।
“अजीब होते है समय के बदलते क्षण, जहाँ मंजू को होना चाहिए, वहाँ मैं हूँ ।” थोड़ी झुलझुलाहट-सी मन में हो रही थी । सुब्बीर के विवाह के बाद से मैंने मंजू को देखा नहीं था । सुब्बीर और मैं दोनों जब कभी मिलते तो , बाहर किसी होटल या रेस्टॉरेंट में ही मिलते, खाते-पीते, बातें करते थे ।
मन में उठ रहे झोंकों को अब हवा देने का समय नहीं था । फटाफट तैयार होकर अस्पताल की ओर अपनी गाड़ी लेकर निकल पड़ा । आज मुझे सड़क दोनों ओर लगे पेड़ों पर पीले फूल सुब्बीर से लगे, बिलकुल वैसे ही चेहरे के रंग से रंगे हुए । पता नहीं कब से इसकी तबीयत ख़राब होगी, मन ही मन में अपनी बीमारी की चादर ओढ़ सोता रह होगा !…तक़रीबन छ: महीने पहले ही हम दोनों प्लाज़ा रेस्तराँ में मिले थे । उस समय उसके चेहरे पर हल्का गुलाबीपन था , हो भी क्यों न ! गोराचिट्टा रंग , उस पर तीखे नैन-नक़्श, ठोढी पर फ़्रेंच कट दाढ़ी , हल्के गेहुँए रंग का टर्राउजर , हल्के पीले रंग की शर्ट ….!
गाड़ी के स्टीयरिंग को संभालते हुए ज़ोर से ब्रेक लगाना पड़ी । भागते हुए बच्चे को आवाज देकर कहा, दिखता नहीं है क्या ? सिगनल देख कर रोड क्रॉस नहीं कर सकते ! “
वह बच्चा मेरी आवाज को अनसुना कर तेज़ी से दौड़कर दूसरे किनारे पर लगे ठेले के पास पीठ मोड़ खड़ा हो गया ।
कुछ गज़ गाड़ी दौड़ाने के पश्चात, गाड़ी अस्पताल के गेट के पास खड़ी कर उतरकर तेज़ी से सुब्बीर के कमरे की ओर बड़े-बड़े क़दम बढ़ा दिए । सुब्बीर को सोया हुआ जानकर, पलंग के समाने रखी कुर्सी पर बैठ गया । आँखें मूँदे-मूँदे ईश्वर से दुआएँ माँगने लगा । बीच-बीच में बूँद-बूँद रिसती ज़िंदगी के हर पड़ाव को समेटने लगता । बूँद-बूँद से बरसे यह क्षण जीवन के प्रतिपल घटते क्षणों को आकार देते हैं , जिसमें हर व्यक्ति अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप ढालता है । और उसी राह पर चलता है । खुली आँख से चले या आँख मूँदकर चले । दोनों रास्ते उसे स्वयं ही समय-असमय बुलाते हैं । यहाँ किसी के सुझाव की गुंजाइश भी कहाँ रह जाती है ?
अगले ही पल,नर्स की आवाज ने इस सोच के जाल को बींध दिया । आँखों में छायी बदली नर्स की आवाज में कहीं खो गई ।
नर्स ने पूछा, “ आप इनके कौन हैं ? “
जी, मित्र ।
अगला सवाल रौआब से भरा हुआ – “ इनकी पत्नी बच्चे कहाँ है ?”
“पत्नी शिमला और दो छोटे बच्चे अपनी नानी के घर पर हैं ।”
“क्या आप जानते हैं ? इनकी यह हालत कब से ख़राब है ? आपके मित्र …लगता है काफ़ी लम्बे समय से शराब अधिक मात्रा में पी रहे थे, शायद अधिक बार ख़ाली पेट भी लेते रहे हैं । आज लीवर ने इनका साथ छोड़ दिया है । डॉ सिन्हा शायद आपको कुछ न बता पाएँ, परन्तु आप कैसे भी करके इनकी पत्नी को यहाँ बुला लीजिए । बहुत कम प्रतिशत की उम्मीद बाक़ी है । उनके यहाँ आने से शायद आपके मित्र स्वयं को उनमें ढूँढ सकें और शायद अपनी उस आत्म-शक्ति के सहारे ख़ुद के जीवन को कुछ वर्षों के लिए जीवित रख सकें । “
यह सब कहकर नर्स कमरे से बाहर चली गई ।
उसके शब्दों न जाने कैसे मेरे अंदर ऊर्जा भर दी कि मैं सुब्बीर के घर की चाबी ले, वहाँ से तुरंत निकल गया । टेबल पर पड़ी सुब्बीर की डायरी से मंजू का मोबाइल नंबर ढूँढने लगा और नानी के घर का भी । दो तीन पन्ने पलटते ही दोनों के फ़ोन नंबर मिल गये । पहले नानी को फ़ोन पर सुब्बीर की सेहत के बारे में बताया । नानी ने ग़ुस्से से यह कह कर फ़ोन पटक दिया कि हमारा पिछले दो साल से कोई रिश्ता ही नहीं है । पी-पीकर मरने दो, हमारी बला से ..।”
यह सुन , काटो तो ख़ून नहीं जैसी मेरी हालत हो गयी ।
मंजू को फ़ोन करूँ या न करुं , इसी कश्मकश में उसे फ़ोन लगा दिया । मंजू ने फ़ोन उठाया । मेरी आवाज को पहचानते ही फ़ोन कट करने लगी । बड़े ही भारी मन से उसे निवेदन किया कि एक बार कैसे भी करके सुब्बीर से मिलने आ जाए । और कहा, “ तुम्हें तुम्हारे पहले प्यार का वास्ता है । “
मंजू कुछ सोचकर मान गई । आज ही वह शिमला से वापिस आ रही है । और शाम तक यहाँ पहुँच जाएगी । शर्त यह है कि मुझे उसे एयरपोर्ट से रिसीव करने ख़ुद आना होगा । मैं इस समय अपने मित्र की ख़ातिर सब कुछ करने को तैयार था । डॉ सिन्हा से उसके लीवर ट्रांसप्लानटेशन की बात भी कर चुका था । उसके ख़र्च का सारा भार उठाने को तैयार था ।
शाम होने की प्रतीक्षा करने लगा । मंजू से ये मुलाक़ात मेरे कोई उत्स लेकर नहीं आ रही थी । बस, एक ही ज़िद्द से मन जूझ रहा था । बस, एक बार सुब्बीर भला-चंगा हो जाए ।
घड़ी पर बार-बार नज़र दौड़ाते-दौड़ाते ,एयरपोर्ट पर मंजू को देखते ही पहचान लिया । और रास्ते भर बिना एक भी शब्द बोले अस्पताल पहुँच गये । मंजू का मन और चाल दोनों अलग-अलग चल रहे थे । यह बात सुब्बीर के कमरे की ओर बढ़ते तेज़ क़दमों से स्पष्ट हो गई । यह देख मेरे मन को सुकून हो गया । प्रेम, बातें, ग़ुस्सा, लड़ाई-झगड़ा मन में अपना- अपना स्थान रखते हैं । रिश्ते समय का मूल्याँकन करते है । रिश्तों के बीच फैली दूरी का भी ।
सुब्बीर की हालत देखते ही मंजू सपाट आँखों से कुछ कहने को हुई । मगर स्वयं को रोक, पूछने लगी, “कब से बीमार हैं ? “मैंने एक ही साँस में सारी बात बता दी ।
“जानते हो रमेश, हम दोनों का आपस में झगड़ा इसी शराब को पीने को लेकर ही होता था ।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि सुब्बीर विवाह के बाद से धीरे-धीरे बीयर से शुरू कर व्हिस्की क्यों पीने लगे । और फिर शराब पीना बढ़ता ही गया । दो बच्चे के पिता भी बन गये । अपनी सारी कमाई पीने में उड़ाने लगे । घर चलाना दिन-प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा था । मेरे माता-पिता भी आख़िर कितने दिन मेरी गृहस्थी को ढोते , आख़िर सुब्बीर की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मैंने नौकरी करने का निश्चय कर लिया । बच्चे पलने लगे और घर भी चलने लगा । उधर सुब्बीर की शराब पीने की आदत बढ़ने लगी । दो साल पहले ही,… मैं सुब्बीर को छोड़ अपने मायके चली गई । मुझे याद है , उस दिन हम दोनों में खूब झगड़ा हुआ था । सुब्बीर ने खूब शराब पी थी । इसी झगड़े में उसके मुहं एक बात सुन कर में दंग रह गई, मेरे पैरों तले से ज़मीन ही निकल गई । “
“ किस कारण से मेरा घर संसार बसने से पहले ही अंधेरे में चला गया, क्या तुम सुनना चाहोगे ?”
मैंने मंजू के चेहरे को सरसरी नज़र से देखा । उसका चेहरा पतझड़ के टूटे पत्ते सा बिखरा दिख रहा था । मैंने बिना किसी लाग लपेट के कहा, “ हाँ” ।
मुझसे विवाह के बाद एक दिन सुब्बीर ने पूछा था, ‘ शादी से पहले मेरे सिवाय तुम्हें कोई ओर भी चाहता था क्या ? मैं सुब्बीर को खुले मन वाला व्यक्ति समझती थी । शंकालु तो क़तई नहीं । उसके व्यवहार से मुझे कभी नहीं लगा कि वह मुझ से अलग है । हमेशा ऐसा लगा हम दोनों एक हैं । सुब्बीर को मैंने तभी हँसते-हँसते बताया , दूर क्यूँ जाना, आपका बचपन का दोस्त मुझसे प्यार करता था, मगर मैंने दो-टूक उससे कह दिया , “ मैं सुब्बीर से प्रेम करती हूँ । यह सुनते सुब्बीर हँसने लगे और मैं भी बहुत देर तक हँसती रही ।“
उस दिन सुब्बीर ने इस बात पर ठहाका लगाया और कहा जाओ चाय बना लाओ , दोनों साथ में पीते हैं । मैं इस बात को कह कर भूल गई । परन्तु सुब्बीर इस प्रेम के दाने बीनने में अकेला ही जुट गया । मुझे ऐसा लगता है- “तुम्हारी और सुब्बीर की दोस्ती न छूटी है और न ही टूटी है ।”
मंजू की बातों को सुन मैं आश्चर्य से मन ही मन धँसता जा रहा था । समय की नाजुकता को भाँपते मैंने जवाब सवाल करना उचित न समझा । बस, मंजू से इतना ही कह पाया, अब तुम चिंता न करो, कुछ दिन मायके मत जाओ, यहीं सुब्बीर के पास रहो । मैं डॉ सिन्हा से सुब्बीर के स्वास्थ्य की जानकारी लेता रहूँगा और यदि लीवर ट्रांसप्लानटेशन की आवश्कती हुई , वह सब ख़र्च मैं करुंगा । मंजू ने सिर झुकाते हुए “ हाँ” कह दी । मैंने मंजू से कहा, “ अब मैं सुब्बीर से मिलने नहीं आ सकूँगा, तुम्हें इसकी देखरेख करनी है । जिस दिन सुब्बीर यहाँ से डिस्चार्ज होगा , उस दिन दोनों से मिलने आऊँगा । यह कह कर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना शीघ्रता से कमरे से बाहर निकल गया ।
सात दिन पश्चात डॉ सिन्हा ने बताया कि सुब्बीर की सेहत में काफ़ी सुधार हो रहा है । यह सुन, मेरी ख़ुशी की कोई सीमा ही न रही । जीवन के बदलते कड़वे सच को शब्द इतनी आसानी से तोड़-मरोड़ देते है । मेरे लिए मंजू के प्रति प्रेम बूँद-बूँद से बरसे अमृत रस जैसा था , जिसे कभी मैंने तोड़ने-छोड़ने की चेष्टा भी न की थी । आज सुब्बीर अस्पताल से निकल अपने सुनहरे पलों को मंजू और अपने बच्चों के साथ जीने लगा था । अस्पताल से निकलने पहले उसने मुझे फ़ोन किया , “मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ ।” मैंने कहा, मैं आज रात विदेश जा रहा हूँ , बताओ, कौन-सा ब्रांड पीना पसंद करोगे । और सुनो, मेरे मित्र हो या नहीं ! …परन्तु एक बात तुमने मुझसे नहीं सीखी । जानते कौन-सी ? “
“ कौन-सी? “ वह बोला
“ सुब्बीर ! प्रेम जब भी किसी से करो तो आदर-सम्मान से करो । बेवजह किसी के सपनों के घरौंदे को पैरों से कुचला नहीं करते । प्रेम का आनंद प्रेम के बूँद-बूँद से बरसने में हैं। पंछी भी जब अपना घोंसला मिलकर बनाते हैं … अपने बच्चों की परवरिश साँझा होकर करते हैं। वह कभी अपने दायित्वों से विमुख नहीं होते । “
वह कुछ नहीं कह पाया । अब , मुझे उससे किसी उत्तर की उम्मीद नहीं थी । फ़ोन रख कर अपने बिस्तर पर सो गया । यही सोचकर , कल फिर नयी सुबह होगी ! बूँद-बूँद प्रेमामृत केवल ….मंजू …मंजू…मंजू ही …बरसाती रहेगी और स्याह रात के सन्नाटों और स्मृतियों में मेरे जीवन की इस काली सड़क पर जहाँ तक हो सकेगा धूप बिखेरती रहेगी ।

शशि दीपक कपूर
मुम्बई
(स्व- रचित एवं मौलिक)

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