लघुकथा: मानव सेवा ही माधव सेवा – दीपक अनंत अंशुमान,केरला

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लघुकथा
मानव सेवा ही माधव सेवा

जब हम उस झोपडी के सामने पहुँचे,अपनी निर्निमेष आखों से वह हमारा इंतजार कर रहा था। उसकी आखों में तब एक अजीब सी रोशनी थी। चेहरा फूलों जैसे खिल उठे,वो गरीब बच्या एसा ही है၊ जब हम उससे मिलते है चहरे पर एक छोटी सी मुसकान वो हमारे लिए सुरक्षित रखते थे।रवि तो अच्छा लडका है और बड़ों का कदर करना वो अच्छी तरह जानता है, प्रधानाध्यापक की बातें मेरी चारों तरफ गूँज रहे थे। हमारे स्कूल के होशियार बच्चों में से एक है रवि၊ चाहे वो पढाई हो,खेलकूद हो। वह अच्छी तरह गाता भी था। स्कूल के लिए कई प्रतियोगिताओं में वह भाग लेते थे और पुरस्कार भी हाज़िल करते थे।
हिंदी के पीरियड में जब मैं पढ़ाने के लिए कक्षा में आता सब बच्चों की तरह वह भी खडा होता लेकिन इतना एक फ़र्क तो है कि जब वह मुझे उस बरामदे में आते देखते ही अपनी जगह पर खड़ा रहता और मेरा इंतज़ार करता၊
अन्य बच्चे सब बैठने के बाद भी वह खड़ा रहता और मेरी इशारे के बाद ही वह बेठता। कविताएँ वह बहुत पसंद करती थी और जब कक्षा में कविता पाठ पढाते वक्त वो एक विशेष ध्यान भी रखता। मानव सेवा ही माधव सेवा है यह तत्व उसके आत्मबोध के साथ उस छोटी सी उम्र में जुड गये। कभी कभी शंकाओं के समाधान के लिए अपनी हिंदी पुस्तिका लेकर वो स्टाफ रूम में आया करता था। अर्थात् वह एक ज्ञान पिपासु था।
दो दिन पहले किसी पड़ोसन के फोन से वह मझे बुलाया। सर जी,नमस्ते मैं रवि,आठवीं दर्जे का छात्र। क्या बात है बेटा मैने पूछा।जी,पिताजी के कहने के अनुसार ही मैं आपको बुला रहा हूँ।
अभी तुम्हारे पिताजी कैसे है ?मैने पूछा। वे एक मज़दूर थे और एक दुर्घटना के उपरान्त विश्राम कर रहे थे၊ अभी ठीक हो रहा है सर जी,,၊ अच्छा बताओ,नू ने तो फॉन क्यूँ किया बेटा ? जी पिताजी आप और हेडमास्टर से मिलना चाहते है। क्या आप हमारी झोपडी में आवोगे क्या जी?
क्यूँ नहीं रवी,बीस साल पहले मेरी भी एक झोपड़ी थी। पिताजी से कहना हम ज़रूर आयेंगे, हाँ इस
रविवार को ही हम आयेंगे।
आज वो रविवार का दिन है और अब हम रवि के झोपड़ी के सामने। रवि दौड़कर हमारे सामने पहुँच गये थे। खुशी से वो झूम उठे और सिसकियाँ भरने लगे၊ नमस्ते सर जी,नमस्ते
प्रधान अध्यापक जी ! जी नमस्ते.,,,अरे आओना रवि, क्या हम अन्दर चलें ? जी.,, सर जी !!
जब हम अंदर पहुंचे पिताजी उढने के प्रयास में थे। अरे अरे आप मत उढना जी, हेडमास्टर ने कहा। मैंने उसे पकडे आहिस्ता बिस्तर पर लेट जाने की सहायता की।
अम्माजी जल्दी वहाँ पहुँच गयी रसोई से और हमें प्रणाम करके अंदर चली गयी। तब पिताजी ने अपनी बिस्तर के नीचे से एक गंदी धोती निकाली और आहिस्ता खोला।उसमें कुच्छ पैसे थे၊ वे बताने लगे यह पैसा रवि की है। वक्त मिलने पर थोडा वो भी कमाता है। ये तो उसने साइकिल खरीदने के लिए इकट्ठा किये थे, रोज 8 मील पैदल चलकर ही स्कूल आया करता है၊ दो दिन पहले वो मुझसे कहा था कि उसके सर्कारी स्कूल में भी सामूहिक भोजनालय चलते है। बेसहारों को वहाँ से रोज़ भोजन देते है।इसलिए इस महामारी के लॉक डाउन में मै भी इस समाज के लिए कुच्छ करूँ ! कृपया आप लोग ये पैसे स्वीकार कीजिए। अन्त में हमें वो पैसा स्वीकार करना पड़ा၊ ब्लाक कॉफी पीकर हम वापस चले। अब मैं अपने घर पर हूँ और वे पैसे गिन चुका हूँ, करीब पंद्रह सौ रुपये के आसपास । जब हम उसके घर से पलटते थे तब मैं ने रवि के चहरे पर देखा तब वो मुझसे कह रहे थे। उसका अब मैं समझ चुका हूँ।’ मानव सेवा ही माधव सेवा है’ मुझ में जो अध्यापक था वो तब रवि का प्रणाम कर रहा था। गुरु के कई अर्थ होते हैं।

दीपक अनंत अंशुमान
कवि एवं अध्यापक
केरला

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