काव्य भाषा : शख्सियत – संध्या चौधरी उर्वशी , राँची

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शख्सियत

शख्सियत उसकी ऐसी क्यों है?
तेवर उसके ऐसे क्यों हैं?
चेहरे पर ये झुंझलाहट आखिर क्यों हैं?
बात बात में अटकलें लगाते हो
मेरी हर बात में टोकते हो
दिल तो करता है कुछ कहूँ पर
जुबान मेरी लड़खड़ाती क्यों है?
शायद —–बांकपन पर तुम्हारे,
यह बात पर लड़ना चाशनी भरी बातें बोलकर समझाना
यह अनोखी अदा से आँखे हिलाना
ये अदा कहाँ से आई
इसी से तो ये जुबां मेरी लड़खड़ाई
शक्सियत —————
सुन जानेमन कुछ रिश्तो के नाम नहीं होते
फिर भी वे रिश्ते बेकार नहीं होते
इनके बिना जीने का वजह भी नहीं होता
तुमको तो मैने अपने में जोड़ कर रख छोड़ा
फिर मेरी किस बातो ने है तुमको तोड़ा
मौन होकर भी बोलने का ये हुनर जो तुममें है
इसलिए तो ये दिल तुम पे आया है
शायद ——इसी से मेरी जुबान है लड़खड़ाई ।
शक्सियत ————
मान लिया है मैं बेसऊर हूँ पर मगरुर नहीं
दिमाग से नहीं दिल से सोचती हूँ इसी से तो तेरे बारे में सोच कर परेशान हूँ
आता है कुछ बातें करने को कुछ और
बोलकर चला जाता है
हॅसो आती है ये सोच कर ये भोलापन कहाँ से तू लाता है
इसी से तो ये दिल तुमपर आया है
शायद —–इसलिए मेरी जुबान है लड़खड़ाई
डरती हूँ पीठ पीछे वार करने से तेरे से दूर जाने से
बिना तेरे काँधे के मरने से
सुन जानेमन मरती हूँ तुम पर
इन्तजार है बस तेरे लाए कफ़न का
जानता है फिर भी अनजान बने रहने का
इसी से तो ये दिल तुम पे आया है
शायद —–इसलिए मेरी जुबान है लड़खड़ाई ।
शक्सियत ——–

संध्या चौधरी उर्वशी
राँची झारखंड
स्वरचित

1 COMMENT

  1. सुन्दर रचनाओं में शुमार होने की योग्यता है।

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