काव्य भाषा : माँ – अर्पणा दुबे अनूपपुर

Email

माँ

माँ मैं कब बड़ी हो गयी ,मुझे पता नही चला,
जब मैं रोती थी,तू मझको आँचल में छुपा लेती थी,
दूध पिलाकर मुझे सीने से लगा लेती थी,
घुटनो से जब मैं चल कर आऊँ
मुझे उठा गोद मे उठा कर चुम लेती थी,
जब डरती थी और सोती नही थी
मुझे रोली गा गा अपने सीने से लगा कर सुला लेती थी,
जब रोती थी स्कूल नही जाऊँगी
तू मुझको ज्ञान भर कर बाटती थी,
तू मुझको स्कूल, कॉलेज का महत्व बताती थी,
पढ़ लिखकर डॉक्टर बनूँ यह सिखाती थी
मेरे मना करने पर जब तू मेरा विवाह तय की
तो तू मझको घर गृहस्थी के बारे में बताती थी,
माँ मैं कब बड़ी हो गयी मुझको पता नही चला,,,,।।

अर्पणा दुबे
अनूपपुर

1 COMMENT

  1. एक माँ के सामने ही हम बूढ़े होकर भी बच्चे ही रहते हैं,बहुत खूबसूरत लेखन💐

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here