काव्य भाषा : बरसात -राजीव रंजन शुक्ल पटना

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    सुखी और प्यासी धरती को पुनः हरा भरा करने बरसात आती है पर यही जब अपने रौद्र रूप मे आती है तो हजारों -लाखों जीवन संकट मे आ जाती है। आज न्यूज़ चैनलों मे असम और बिहार के नदियों का रौद्र रूप दिख रहा है ।कई क्षेत्रों मे जीवन बिलकुल दुश्वार हो चुका है। अराधना है, विनती है , प्रार्थना है ईश्वर , शीघ्रताशीघ्र ही इस संकट से मुक्ति दिलाये ।

बरसात

करने धरा को हरा भरा
आती है बरसात
गर्म और सुखी धरा की प्यास
बुझाने की रहती जिससे सबको को आस
करने सुहाना दिन और रात
आती है बरसात
पर
जब प्रकृति का कोप बन यह बरसती
गुम हो जाती हजारों –लाखों बस्ती
लाती है नदियों मे बाढ़
करती प्रलय का आगाज
जीवन हुआ कई क्षेत्रों मे दुश्वार आज
बदल अपनी धार
नदियों ने कर दिया उसने लाखों पर वार
लगता है यह महाप्रलय
किया लाखों मानवों और पशुओं का विलय
इस बरसाती प्रकोप से जीवन है सिहर गई
हजारों बीघा भूमि को नदियां है निगल गयी
मुश्किल की घड़ी आई है
प्रकृति ने दुख की नदी बहायी है
कहते है जल जीवन देता
लेकिन यह जल तो जीवन लेता
बच्चे है भूखे प्यासे
माँ बाप भी कुछ नहीं कर पाते
चहुं और है पानी – पानी
पर पीने को नहीं है पानी
भूखे नंगे मानव है
दाने – दाने को तरसे है
कोई ले बचा हमे
देख रहे सभी सपने
कई क्षेत्र नहीं रहे नक्शे पर
जीवन है अब नौके पर
पशु मानव बह रह रहे है
खेतों मे अब रेत पड़े है
त्राहि त्राहि कह रहे है
काली लग रही है अब रात
बंद करो ईश्वर ऐसी बरसात
ईश्वर से अब यही आराधना
दुख और नहीं दो अब यही है याचना॥

राजीव रंजन शुक्ल
(पटना, बिहार)

1 COMMENT

  1. हार्दिक आभार … श्री देवेन्द्र भाई जी 🙏🏻

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