समीक्षा : जीवनानुभव के कठोर भूखंड से मर्म के भावखण्ड पर सम्वेदनाओं की कोमल दूब के छुवन जैसी है ‘अभी अभी मैं लौटी हूँ ‘ -प्रतिमा त्रिपाठी राँची झारखण्ड

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समीक्षा :
अभी अभी मैं लौटी हूँ

जीवनानुभव के कठोर भूखंड से मर्म के भावखण्ड पर सम्वेदनाओं की कोमल दूब के छुवन जैसी है

अजय कुमार जी का कहानी संग्रह *अभी अभी मैं लौटी हूँ।* पढ़ते समय ही ये एहसास करा गयी कि कहानीकार की संवेदना बनावटी नही वरन मिट्टी से उठती खाँटी भावनाओं के जुड़ाव की सुगंध है। ना कल्पनाओं की इन्द्रधनुषी रंगों की मोहक वलयाकृति है, ना कामनाओं की अरुणिम चाहना। ये तो आतप व्यथित संवेदनशील हृदय की वेदना की सच्ची भावभक्ति है।
जीवन के क्रूर धरातल पर उग आए अवांछित समाजिक कुरीतियों की कंटीली बेल और लालफीताशाही की चाबुक से चिपकी गरीब शोषित वर्ग की पीड़ा है। जिससे आहत होकर छटपटाता कोई एक वर्ग विशेष की  नही बल्कि ये हर उस गरीब मजबूर की वेदना है जो आर्थिक, समाजिक परिधि से खुद को दूर पाता है।

उनकी कहानियों में गाँव, खेत, खलिहान, किसान, मजदूर, दिहाड़ी मजदूरों की जिजीवषा महसूसने लायक है। लीक से हटकर नही वरन उसी लीक पर चलकर उनके विचार एक नया दृष्टिकोण देते है, जमीनी और कागजी अंतर के यथार्थ को समझने और विचारने का।
उनकी कहानियां गंवईपन की मिट्टी से नहायी हुयी है। और ये तभी हो सकता है जब रचनाकर उस धूल में खेला हो, उस परिवेश को जिया हो, समाजिक ताने बाने में रच बस गयी विद्रूपताओं को बहुत करीब से देखा हो।
सीधे सरल शब्दों में खुद के भीतर उठने वाले संवेग को हुबहू कलमबद्ध करना ही उनका उद्देश्य जान पड़ता है।
आज यथार्थ लेखन के नाम पर जिस तरह सम्वेदनाओं की परतें उघाड़ी जा रही है। वर्ग विशेष को आधार बनाकर उनके दुःख को पुरस्कारों के नाम पर बेचा जा रहा। उसके विपरीत उनकी कहानियां यथार्थ के धरातल पर बहुत सलीके से उकेरी गयी है। जैसे जीवन के बीहड़ से चुनी हुयी कड़वी, मग़र औषधीय गुणों से युक्त अनुभव की अनुभूतियां हो।

भाषा, व्याकरण, अलंकृत शब्दावली, अभिव्यक्ति की लच्छेदार शैली से खुद को बचाये। उनकी यह कृति अलहदा है। ग्रामीण ऊबड़खाबड़ पगड्डियों पर चलते उनके शब्द आमजन के सरोकार से जुड़े है।
इस पुस्तक की पहली ही कहानी “लखमिनिया का मेला” एक भूमिहीन ग्रामीण किसान की बेबसी का जीवंत चित्रण है। जो अपनी एक मामूली इच्छा एक फ़िल्म देखने की हसरत भी पूरी नही कर सकती। किंतु उसकी संवेदना इतनी व्यापक और उदार है कि अपनी इच्छा को परे रख धनुआ के बछड़े को वापस लाना उसके जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनती है।
सच में कहानीकार का स्वगत कथन ये साबित करता है कि..”जैसा देखा, जिस परिस्थिति को जिया है, वैसा ही लिख दिया है।”
इस संग्रह की दूसरी कहानी “लाली” भी विचार करने पर विवश कर देती है कि नगर के सौंदर्यीकरण के नाम पर गरीबों की रोजी रोजगार की आहुति…विकास के स्वप्न को जमीन पर उतरने देगी या यह सिर्फ एक भ्रामक लोकलुभावन प्रस्ताव बनकर ही रह जायेगा।
“महंगा कफ़न” समाज में व्याप्त भयावह कुरीतियों एवं दिखावे के चरित्र पर करारा प्रहार है। लेखक ने इस कहानी में सरकारी लीपापोती और इस महकमें में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी राजन की व्यथा के माध्यम से बखूबी उभारा है। सरकारी महकमें के नाक के नीचे से आरक्षित जमीनें बेच दी जाती है। और उसकी आँख तब खुलती है, जब लोग अपनी दुनिया बसा निश्चिन्त हो जाते है। वोट बैंक की सरपरस्ती के लिए बसायी गयी ये बस्तियां, हजारों जीवन लील कर भी उन महकमों के लिए सबक नही बनती।
“दुश्मन कौन?”  ये कहानी भी अपने शीषर्क के अनुरूप ही हमारे जेहन में एक प्रश्न छोड़ जाती है। कि आखिर हम शोषित पीड़ित किससे है? क्या ? सर्वहारा वर्ग के नाम पर मलाई काट रहे इसी वर्ग के लोग, अपने पद दायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर रहे है। इसके साथ ही इस कहानी में लेखक ने एक मजबूर विवश महिला के स्वाभिमान को भी अपनी कलम से बहुत सम्मानित ऊँचाई दिया है।
“बार बार हर बार” कहानी में भी सरकारी उच्च पदों पर बैठे महानुभावों के व्यवहार और चरित्र का बखूबी चित्रण है।
इस संग्रह की एक और कहानी “पाप और पुण्य” हमारे समक्ष एक प्रश्न विचार के रूप में रखती है कि कब तक स्त्री अपने स्त्रीत्व के लिए संघर्ष करती रहेगी। समाजिक विद्रूपताओं में घुट कर तड़पाती उसकी आत्मा लाँछन और सामाजिक कुरीतियों से कब और कैसे मुक्त होगी?
वही उनकी कहानी “ब्याहता” विचार करने पर विवश कर देती है कि क्या पारिवारिक व्यवस्था मात्र एक सामाजिक खानापूर्ति बनकर रह गया है। इस कहानी में कांता की जिंदगी की बर्बादी का कारण है सुभाष के पतन का। वैवाहिक व्यवस्था और इसकी समाजिक परिस्थिति का विश्लेषण फिर से नए सिरे से होना चाहिए ताकि इससे प्रभावित परिवार विशेषकर स्त्री को जीवनयापन का एक आर्थिक आधार मिल सके।
इस कहानी संग्रह के शीषर्क को परिभाषित करती उनकी कहानी “अभी अभी मैं लौटी हूँ।” इसमें लेखक दो आर्थिक असमानता का स्तर रखने वाले परिवार के माध्यम से रिश्तों की व्याख्या का बहुत सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है। ये कहानी इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करती है कि….”रिश्ते हमेशा अपने बराबरी में करने चाहिए।” इस कहानी में भी इस आर्थिक विसंगति के भंवर में डूबे रिश्तों का बहुत जीवंत चित्रण है। साथ ही मूक कहे जाने वाले जानवर छबरा (कुत्ता) के माध्यम से प्रेम, स्नेह, निष्ठाभाव का सहज चित्रण कर  उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया गया है कि मूक जानवर भी सच्चे प्रेम की भाषा समझता है। परंतु मनुष्य अपने अहम लालच और स्वार्थ के अग्निकुंड में अपने परिणय जैसे आत्मीय सम्बन्ध की भी आहुति देने से नही चुकता।

इस संग्रह में कुल आठ कहानियां है। ये सारी की सारी कहानियां पढ़कर आप खुदको इससे जुड़ा महसूस करेंगे। अजय कुमार जी एक सरकारी अधिकारी है। रोजमर्रा के जीवन से मिले अनुभव और सामाजिक विसंगतियों के पंक में गिरे शोषित पीड़ित आर्थिक स्तर पर विवश जन की कहानी है। इससे पहले इनका एक काव्य संग्रह “मन गलियों में ही रमता है।” प्रकाशित हो चुका है। जिसमें व्यवस्था की खामियों से लेकर सामाजिक विद्रूपताओं तक पर उनकी कलम सरपट दौड़ी है।

“इनकी कहानियां यथार्थ के नाम पर विचारों की कुरूपता नही है बल्कि संवेदना की मृदा में अंकुरित सहानुभूति की वैचारिक कोपलें है।”

दबे कुचले आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग की बुलंद आवाज़ है उनकी कहानियां। उनकी लेखिनी एक समर्थ संवेदनशील रचनाकर की सहज अभिव्यक्ति है। जिससे उन्हें सहानुभूति के धरातल पर सच्चे रचनाकर के रूप में स्थापित कर दिया है।
अपनी कहानियों के माध्यम से अजय कुमार जी अपना एक अलग मुकाम बना रहे है। इस कहानी संग्रह के लिए मेरी हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं।

प्रतिमा त्रिपाठी
राँची झारखण्ड।

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