लघुलेख: शांति और समस्या -सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र

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लघुलेख
शांति और समस्या

मानव जीवन में समस्या प्रकृति नहीं पैदा करती वरन् प्रकृति विरोध करता है। सहज जीवन जटिल होता जा रहा है। एक दूसरे पर अधिकार की आकांक्षा प्रबल होती जा रही है। अधिकार ज़मीन जायदाद का ही नहीं विचारों का भी होता है। सत्य, सत्य है, उसे सिद्ध करने की क्या आवश्यकता? पर सिद्ध करने की होड़ लगी है और मेरा तेरा सत्य में सत्य को विभाजित कर दिया गया प्रतीत होता है। आज देश ही नहीं अपितु समूचा विश्व बहुत बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है। हमारे देश की सरकारें महामारी और आर्थिक मंदी से बचाने के लिए जी जान से कोशिश कर रहीं हैं। संकट के समय भारत की सामूहिक शक्ति एक मिसाल बन जाती है। हम जनता का सौभाग्य है कि मोदी जी जैसे देश को प्रधानमंत्री मिले हैं तो एक से बढ़कर एक मुख्य मंत्री मिले हैं। लोकतंत्र किसे कहते हैं, यह जानने के लिए भारत को देखा जाए, जहां राजनीतिक मतभेद भी हैं, आरोप प्रत्यारोप भी हैं और संकट से उबरने की उत्कट अभिलाषा भी है।
इसी प्रकार मानव हृदय में शांति पैदा नहीं की जाती, वह तो स्वभाव गत है। पैदा तो अशांति की जाती है या यूं कहें कि हो जाती है। परंतु इस पैदायशी अशांति का स्वरूप भी बहुत बदल गया है। पडौसी की सुख शांति से ईर्ष्या अब बढकर भाई भाई तक पहुंच गई है। एक भाई की सुख शांति दूसरे भाई से सहन नहीं होती, पता नहीं क्यों। दूसरे की सुख शांति से अशांत रहना हमारा स्वभाव सा बनता जा रहा है।जब मैं आत्मावलोकन करता हूं तो पाता हूं कि दूसरे की सफलता से बहुत दुखी हूं और परस्पर प्रेम की भावना भी तभी तक है जब तक दूसरा मुझसे कम सुखी है। ईश्वर की ओर उन्मुख होता हूं वहां भी ऐसा ही मानवीकरण पाता हूं। प्रकृति से दूर रहने के लिए तो वैसे ही बहुत से उपाय कर रखे हैं। नये उपायों की तलाश भी रहती है। और यह तलाश या उपलब्धि ही आज प्रगति का परिचायक है।
हृदय में शांति बनाए रखने के जितने प्रयास करता हूं उतनी ही समस्या बढ़ती जाती है। शांति खोती जाती है। जितनी प्रशंसा मिलती है, उतना ही अच्छा लगता है, शांति सी महसूस होती है पर जब प्रशंसा नहीं मिलती तो शांति का नामोनिशान नहीं दिखता। ब्लड प्रेशर, सुगर, डिप्रेशन सब बढ़ जाते हैं। नहीं बढ़ती तो शांति और समस्या तो चिरस्थाई प्रतीत होती है।

सत्येंद्र सिंह,
पुणे, महाराष्ट्र।

3 COMMENTS

  1. धन्यवाद सोनी जी प्रकाशन के लिए।

  2. सचमुच सत्य को साबित करने कि जरूरत नहीं होती है, लेकिन अब होड लगी है। हर किसी को लगता है, वह जो कहते हैं, वही एकमात्र सत्य है।
    प्रशंसा से शांति पानेवाले अल्पजीवी संतुष्ट होते हैं। अच्छा वैचारिक आलेख। धन्यवाद!

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