लघुलेख : ज़मीन चाहिए – सत्येंद्र सिंह,पुणे

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लघुलेख

ज़मीन चाहिए

ज़मीन एकमात्र सत्य है, आधार है अस्तित्व का। इसीसे पैदा होता है, इसीमें समाता है। फिर भी हर मनुष्य को, समाज को, धर्म को, समुदाय और हर देश को ज़मीन चाहिए। हर कोई व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से पूरी ज़मीन चाहता है। सब यह जानते हैं कि न तो कोई इस ज़मीन को कहीं लेकर जा सकता है और न कहीं पर रख सकता है, पर अपने अधिकार में रखना चाहता है। पर क्यों, यह न कोई जानता है, न जानना चाहता है।
आज पूरे विश्व में महामारी फैली है, लोग हजारों नहीं लाखों की संख्या में मर रहे हैं। मरने की इस प्रक्रिया की न कोई चिकित्सा है, न कोई रोकथाम। फिर भी लोग लगे हैं ज़मीन पर अधिकार जमाने में। इतना बड़ा देश है चीन, बहुत ज़मीन है उसके पास। कोरोना विषाणु वहीं पैदा हुआ, जिससे पूरा विश्व संकट में आ गया है लेकिन फिर भी भारत की ज़मीन चाहिए, भूटान की चाहिए। वहां बड़े बड़े फ़कीर हुए हैं, जिन्होंने वर्तमान क्षण के औचित्य और ज़मीनी सच्चाई बताई है पर ऐसा कोई नहीं है जो ‌यह समझाए कि भाई क्या करोगे ज़मीन लेकर। जो है उसी को संभाल लो। अधिकार करके ही क्या मिल जाएगा। जो लोग मर रहे हैं, मरने के कगार पर हैं, उन्हें बचालो, ज़मीन क्या उनके दिलों पर तुम्हारा अधिकार हो जाएगा। मानवता से प्रेम करो, उसे बचाओ तो जब तक पृथ्वी का अस्तित्व है तब तक तुम्हारा नाम अमर रहेगा। तुम रहो न रहो, तुम्हें सम्मान से याद किया जाएगा। पर नहीं, कोई मरे गिरे, मनुष्य जीवित रहे या न रहे, पर उसको तो ज़मीन चाहिए, उस पर अधिकार चाहिए।
यह ज़मीन अदृश्य भी होती है। मिट्टी ही नहीं, विचारों की भी ज़मीन होती है। उस पर भी अधिकार की बात सोचता है मानव। सोचता है कि उसके विचारों के अधीन सब लोग हो गए तो ज़मीन ‌पर तो उनका अधिकार स्वत: हो जाएगा। ऐसे मनुष्य अपने को अन्य लोगों का नेता मानते हैं, सेवक मानते हैं, उनके हितों का रक्षक मानते हैं, पर उसके लिए सत्ता चाहिए, उच्च पद चाहिए, धन दौलत अधिकार और शासन चाहिए, जिसके बिना वे कोई सेवा नहीं कर सकते, कोई हित नहीं कर सकते। लोग मर ‌रहे है और वे सत्ता के इंतजार में मरते हुओं को देख रहे हैं।
पता नहीं क्या करेंगे सत्ता का, अधिकार का, ज़मीन का। जब पूरी मनुष्य जाति ही नहीं रहेंगी तो वे कहां रहेंगे। बस उन्हें तो ज़मीन चाहिए।
सत्येंद्र सिंह
पूर्व वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी मध्य रेल
आंबेगांव खुर्द पुणे 411046 महाराष्ट्र
मो 9922993647

11 COMMENTS

  1. लघु लेख बहुत अच्छा है। विस्तृत होता तो और भी अच्छा होता । तथापि श्री सत्येंद्र सिंह जी बधाई के पात्र हैं। इस दुनिया में सारा झगड़ा तो जमीन का है । जमीन को लेकर ही तो सारे कार्य व्यापार चलते रहे हैं । जब महाभारत में कहा गया कि 1 इंच भी जमीन नहीं दी जाएगी, तो क्या हुआ….. हम सब जानते हैं।

    • धन्यवाद। यह लघुलेख मेरी नई विधा है।

  2. जमीन तो भाई भाई को दुश्मन बना देती है,पता नहीं क्यों लोग यह नहीं सोचते कि न कुछ लाए थे न ले जाएंगे फिर किस बात के लिए हम अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं।कुछ नहीं शायद यह मनुष्य की तृष्णा है जो उसे यह सब करने को बाध्य करती है ।

  3. पृथ्वी पर मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे जमीन की लालच है जबकि उसे मालूम है मुझे अंत में 2 गज जमीन ही लगेगी पर वह यह भूल कर जमीन की लालच में अपना पूरा जीवन भाग दौड़ में समाप्त कर देता है। इस सच्चाई को आपने अपनी लघुकथा में प्रस्तुत करके फिर से मनुष्य को सही तरह से जगने का रास्ता बताने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

  4. सभी दार्शनिक तत्वों के संदर्भ आज के वास्तव से जोडे है। युद्ध कितना संहारक होता है,फिर भी मानव समझता नहीं है, जमीन पर अधिकार वृथा संघर्ष है। बहुत सार्थक आलेख, बधाई!

  5. सभी को जमीन चाहिए, लेकिन कितनी? यह विचार बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया। आज की इस करोना की हालात में भी मनुष्य प्राणी की जमीन चाहिए यह चीन का रवैया आपने बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया

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