काव्य भाषा : बचपन से बुढापे तक का सफ़र – माही सिंह राजपुर

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बचपन से बुढापे तक का सफ़र

तब मैं बहुत छोटी थी,
उम्र की कच्ची
अकल की खोटी थी;
गोल-मटोल गुड़िया
नटखट-प्यारी थोड़ी सी मोटी थी,;
खेल-खेल में बड़ी हो गई
अपने पैरों पर खड़ी हो गई,
गिरा पाया न कोई जिसे
लम्बी-मजबूत छड़ी हो गई;
फिर आ गया बुढापा एक दिन
चुपके से, कुछ भी बोले बिन
लड़ता रहा मुझसे रात-दिन,
मैंने बोला बस कर भाई
जाने की अब घड़ी है आई!!

माही सिंह
राजपुर

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