काव्य भाषा : ग़ज़ल -विनीत मोहन – ‘फिक्र’ सागरी

ग़ज़ल

भटके राही सच से जो घबराते हैं
आजादी के नारों से भरमाते हैं

गद्दारी नस नस में बहती है इनके
छेद करें ये जिस थाली में खाते हैं

तय करनी होगी उनकी जिम्मेदारी
जो मासूमों को पथ से भटकाते हैं

खामोशी की चादर मत ओढ़ो नादां
अखबारों में किस्से सब छप जाते हैं

जीती बाजी हाथों से फिसले उनके
जो आगे बढ़ने से भी कतराते हैं

क्या डरना अब दुनिया के तूफानों से
दुख सुख के मौसम तो हरदम आते हैं

कुछ सिक्कों में बँटते देखा ‘फिक्र’ ये घर
उलझे बिखरे टूटे रिश्ते नाते हैं

विनीत मोहन – ‘फिक्र’ सागरी

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