काव्यभाषा : यशु नयन – मिष्टी नवीन गोस्वामी दिल्ली

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यशु नयन

सुनो
पहचानते हो इस आंख को
हां ,ये वही आंख है
जो चुप से देखती रही तुम्हे जाते हुए
दूसरी आंख में उम्मीद थी
नही देखना चाहती थी
तुम्हे चोरी से जाते हुए
नही उम्मीद तोड़ना चाहती थी
सात फेरों के वचन
उसने समा रखे थे सपने
ढांक रखी चादर
मेरी दूसरी आंख ने
लेकिन ये नही मानी
देखना चाहती थी
क्या सच मे फरेब करके जा सकोगे
सो चुप से देखती रही
तुम्हारे राजसी वस्त्रों से मुनि
वेश को
इंतज़ार था इसे
कि चलते हुए एक बार तो बोलोगे
उठो यशु
जा रहा हूँ हमेशा के लिए
तुम्हारी सुनहरी आंखों से सपने लेकर
कर रहा हूँ तुम्हारी
नीली नीली आंखों को हमेशा के लिए नम
लेकिन तुम ना बोले
मेरी आँख भी झांकती रही कोने से
चले गए तुम
मैंने भी आंखों से ना तो
कभी नमी जाने दी
ना तुम्हारी बेवफाई पर
इन्हें रोने दिया
बस भेज दिया इन आँखो को
तुम्हारे पीछे
जहां तक जा पाएं
नहीं रोने दूंगी इनको
इंतज़ार करवाउंगी इन्हें
ओर जब सालों बाद तुम आओगे
मुनि बनकर
तो दे दूंगी
तुम्हारा पुत्र भी तुम्हे
जो इस आंख का तारा है
सजा दूंगी इन आँखों को
तुम्हे चाहने की
तुम्हे निहारने की
तुम्हे पसंद करने की
नही टपकने दूंगी इनको फिर भी
क्योंकि
तुम्हें बहुत पसंद थीं ना मेरी नीली आँखें।

मिष्टी नवीन गोस्वामी
दिल्ली

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