विविध : क्या मैं दृष्टा हूँ? -जगदीश सुहाने दतिया(म०प्र०)

क्या मैं दृष्टा हूँ?

वेदान्त सम्प्रदाय में अद्वैतानुभूति के लिए अनेक प्रक्रियाएं हैं।उनमें एक है-दृष्टा भाव।दृष्टा भाव की सिद्धि होती है-दृष्टा-दृश्य-विवेक से।

इसे दर्शन की पारिभाषिक शब्दावली के स्थान पर आम भाषा में कहें तो संसार को दो भागों में बांट सकते हैं-
१-अहं (मैं)और२- इदं(यह)।

जो देखता है(या अनुभव करता है)वह है-अहं(मैं या दृष्टा)।

और जो देखा(या किसी भी ज्ञानेन्द्रिय से अनुभव किया) जाता है
वह है इदं(यह या दृश्य)।

भगवत्पाद शंकराचार्य ने अपने एक प्रकरण ग्रंथ”दृग्दृश्यविवेक”में इसे बहुत सरलता से समझा दिया है:-

रूपं दृश्यं लोचनं दृक्
तद् दृश्यं दृक्तु मानसम्।
दृश्या धीवृत्तयः साक्षी
दृगेव न तु दृश्यते।।१।।

भावार्थ यह कि जो दीखे वह दृश्य और जो देखे वह दृष्टा।हम संसार में अनेक रूप देख रहे हैं तो रूप हैं दृश्य।रूपों को देखतीं हैं आँखें इसलिए आँखें हैं दृष्टा।परन्तु आँखें भी दृश्य हैं क्योंकि इनके विकारों को मन देखता है।मन देखता है कि अब मेरे नेत्रों की ज्योति मंद हो रही है आदि।इस स्थिति में नेत्र भी हो गए दृश्य और मन हो गया दृष्टा।लेकिन मन की वृत्तियों को साक्षी देख रहा है कि आज मेरा मन क्षुब्ध है, या आज मेरा मन प्रसन्न है आदि।तो मन(अन्तःकरण)हो गया दृश्य और साक्षी(जो साक्षात् देखता है किसी इन्द्रिय के माध्यम से नहीं)हो गया दृष्टा।यह सदैव दृष्टा ही है, दृश्य कभी नहीं बनता।यही साक्षी आत्मा है।

वेदान्त के जिज्ञासु की यहीं आकर भ्रमित हो जाने की संभावना रहती है।वह अपने को प्राप्त-प्राप्तव्य (जो पाना था वह पा लिया-ऐसा)मानने लगता है।

यहीं विचार करना चाहिए कि क्या मैं दृष्टा हूँ?

यहाँ साधक को सचेत करते हुए महर्षि रमण प्रश्न उठाते हैं कि क्या दृश्य और दृष्टा के भेद से आत्मतत्त्व दो हैं?क्योंकि दृष्टा तो तभी होगा जब दृश्य भी हो।

अपने उपदेश संग्रह “सद्दर्शनम्”में वे कहते हैं:-

न वेद्म्यहं मामुत वेद्म्यहं माम्
इति प्रवादो मनुजस्य हास्यः।
दृग्दृश्यभेदात् किमयं द्विधात्मा
स्वात्मैकतायां हि धियां न भेदाः।।
सद्दर्शनम्-३५
इसका मेरे द्वारा किया गया हिन्दी पद्यबद्ध भावानुवाद देखें :-

मैं जानता हूँ स्वयं को, अथवा नहीं मैं जानता।
उपहास योग्य प्रवाद इसको तत्त्वविद
है मानता।।
क्या दृश्य-दृष्टा भेद से भी द्विधा आत्मप्रकाश है?
स्वात्मैकता में भेद-मति को ही कहाँ अवकाश है।।३५।।

आशय स्पष्ट है कि दृष्टा भाव मंजिल का एक पड़ाव है।इसके सहारे हमने संसार की अनन्त विविधताओं को दो में समेट लिया।लेकिन यह अद्वैत निष्ठा नहीं है।

स्वात्मैकता(अपनी आत्मा के केवलीभाव) का ज्ञान हो जाने पर हम जानते हैं कि दृश्य भी नहीं है।वह तो दृष्टा का विलास मात्र है।

अर्थात् यह सृष्टि ब्रह्म का विवर्त है-सत्य नहीं है।गोस्वामी जी के शब्दों में “रज्जौ यथाहेर्भ्रमः”है।
है रस्सी(ब्रह्म)।
अज्ञान (अविद्या)के कारण दिख रहा है साँप(सृष्टि)।

इसलिए अद्वैतनिष्ठा तब है जब ये दो(१-दृश्य२-दृष्टा)भी एक रह जांए।
किसी ने कहा है:-

दृष्टा-दृष्टा एक है, दृष्टा-स्रष्टा एक।
दृष्टा-दृश्य विवेक का फल है दोनों एक।।

जगदीश सुहाने
दतिया(म०प्र०)

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