लघुकथा : धन-लक्ष्मी -शशि दीपक कपूर ,मुम्बई

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लघुकथा

धन-लक्ष्मी

भिखारी ने धनी व्यक्ति के समक्ष अपने हाथ फैलाए, सहृदय धनी ने मुठ्ठी भर सिक्के भिखारी के हाथ में दे दिए । भिखारी प्रसन्नचित हुआ । आज उसे पूरा दिन कड़कड़ाती धूप में खड़े रहकर भीख मांगने से राहत जो मिल गई थी । उसी समय मन में उभरे विचार को वह रोक न सका और धनी को आवाज देते हुए हाथ जोड़ विनती कर एक प्रश्न पूछने की अनुमति मांगने लगा । अत : धनी ने स्वीकृत दे दी ।

भिखारी ने कहा, “अभी आप जिस देवी मंत्र का अनुष्ठान करके आएं हैं, क्या वह मंत्र मुझे बता सकते हैं। इस मंत्र-जाप से शायद मुझ गरीब पर भी मां अपनी कृपादृष्टि बरसा दें । ”

धनी इस प्रश्न से हैरान हुआ और अपने कुल-पंडित से कहा, ” पंडित जी, इसे धन-लक्ष्मी मंत्र बता दीजिए ।”

पंडित पहले तो कुलबुलाया, फिर उसने वह मंत्र भिखारी को याद करवा दिया और साथ में, भिखारी की हस्त-रेखा पर सरसरी दृष्टि डालते हुए बताया कि यह मंत्र तुम्हें कोई लाभ न देगा , लक्ष्मी वहीं विराजती हैं, जिनके पास पहले से ही धन हो । परंतु लक्ष्मी आदेश का अनुपालन करते हुए हम उस धन को वितरण करवाने के लिए ही मंत्र पूजन करवाते हैं। इससे हमारा घर-बार सकुशल चलता है, क्या बताएं आपको राज की बात, ये लोग तो ऐसे हैं कि धन एकत्र कर सांप की तरह कुंडली मार कर उस पर बैठे रहते हैं। ”

भिखारी ने यह सुनकर कहा, ” चलो, फिर इस यात्रा में हमें भी अपना बना लो, नहीं तो….”

पंडित समय की नाजुकता भांपते हुए बोला, नहीं तो….? , आ जाओ मेरे पीछे-पीछे …।

भिखारी धन-लक्ष्मी के सम्मुख नतमस्तक हो पंडित के पीछे-पीछे अनुयायी बन चलने लगा और वह आज तक चल ही रहा है ।

शशि दीपक कपूर
मुम्बई

2 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर लघुकथा है। बधाई।
    देवेन्द्र सोनी जी बहुत बहुत धन्यवाद जो रचनाएं प्रकाशित कर हम जैसे लोगों को लिखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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