नागरिक पत्रकारिता : कोरोना फैल रहा : जिम्मेदार बच रहे – विनोद कुशवाहा

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कोरोना फैल रहा : जिम्मेदार बच रहे

– विनोद कुशवाहा

” युवा प्रवर्तक ” वेब न्यूज़ में ‘ नागरिक पत्रकारिता ‘ के अंतर्गत प्रसारित सौरभ दुबे के आलेख से मैं पूर्णतः सहमत हूं । कोरोना से निपटने के लिये अन्य कारगर चिकित्सा पद्धतियों का भी इस्तेमाल किये जाने की जरूरत है । एलोपैथिक दवाइयों के साइड अफेक्ट्स तो जग जाहिर हैं और शहर के एकमात्र शासकीय चिकित्सालय के हाल भी हम देख ही रहे हैं । इस अस्पताल में अनियमितताओं , अव्यवस्थाओं , लापरवाही का आलम है । बावजूद इसके जिला प्रशासन की मेहरबानी से अस्पताल के अधीक्षक डॉ ए के शिवानी अभी भी डटे हुए हैं । न टेस्टिंग के प्रति उनकी गम्भीरता नज़र आ रही है और न ही इलाज को लेकर अधीक्षक महोदय गम्भीर दिखाई दे रहे हैं । मुख्य नगर पालिका अधिकारी के स्थानांतरण के बाद तो नगर पालिका का कोई माई बाप नहीं रह गया है । महिला बाल विकास विभाग की गतिविधियों की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है । इधर कोरोना संक्रमण बढ़ता जा रहा है । दो – तीन दिन में ही कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर जिले में करीब सौ और इटारसी में लगभग पचास हो गई है । न तो बाहर से आने वालों की प्रशासन को खबर है और न ही ढंग से जांच की जा रही है । कुछ दिन पहले तक तो सेम्पल तक नहीं लिए जा रहे थे । बिजली के बहाने की आड़ में अधीक्षक कब तक अपनी जिम्मेदारी से बचेंगे ? कंटेन्मेंट एरिया भी बढ़ते जा रहे हैं । डॉ शिवानी इसी तरह अपने दायित्वों के प्रति लापरवाह रहे तो आने वाले दिनों में हम इंदौर ,भोपाल , ग्वालियर का मुकाबला करते दिखाई देंगे । तो ऐसे में हम कब तक एलोपैथिक इलाज पर निर्भर रहेंगे ? कुछ नागरिकों से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि वे काढ़ा पीना ज्यादा पसन्द करते हैं । दूसरी ओर डॉ सुनील गुरवानी जैसे योग्य और अनुभवी होम्योपैथिक चिकित्सक भी नगर में मौजूद हैं । जो अब तक सैंकड़ों लोगों को इम्युनिटी बढ़ाने हेतु बिना कोई शुल्क लिए दवाई वितरित कर चुके हैं । ‘ युवा प्रवर्तक ‘ के माध्यम से मैं व्यक्तिगत् रूप से उनका आभार व्यक्त करता हूं ।

जिले के स्वास्थ्य विभाग में अकेला इटारसी ही नहीं अन्य तहसील मुख्यालयों तथा विकास खंडों में भी कमोवेश यही स्थिति है । चाहे सिवनी मालवा हो या फिर माखन नगर ही क्यों न हो । माखननगर के अस्पताल में लोकायुक्त , भोपाल की टीम द्वारा अस्पताल परिसर में स्थित बी एम ओ डॉ शोभना चौकसे के घर से उनके चपरासी को एक नर्स से दस हजार रुपये लेते हुए रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी न तो जिला प्रशासन ने और न ही स्वास्थ्य विभाग ने डॉ चौकसे के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही की । जबकि डॉ शोभना के चपरासी ने कबूल किया था कि उक्त राशि उसने बी एम ओ के कहने पर ही ली थी । यह राशि वेतन निकालने के एवज में ली जा रही थी । लोकायुक्त के पास सबूत के तौर पर डॉ चौकसे का ऑडियो भी है । उल्लेखनीय है कि उपरोक्त महिला चिकित्सक लंबे समय से माखननगर में पदस्थ है । लोकायुक्त की कार्यवाही के बावजूद विभाग ने मात्र खानापूर्ति करते हुए डॉ शोभना चौकसे का स्थानांतर नजदीक के विकास खंड पिपरिया में कर दिया मगर न तो डॉ चौकसे ने वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और न ही उन्होंने सरकारी आवास ही खाली किया । बाद में स्वास्थ्य विभाग की अपर संचालक सपना एम लौवंशी ने भी बी एम ओ डॉ शोभना चौकसे के विरुद्ध कार्यवाही का दिखावा करते हुए उनका तबादला होशंगाबाद जिले से लगे हुए रायसेन जिले के बरेली सिविल अस्पताल में कर दिया । जन चर्चा है कि आगे – आगे देखिए होता है क्या क्योंकि डॉ शोभना चौकसे के लिए ये कोई नई बात नहीं है ।

स्वास्थ विभाग और महिला बाल विकास विभाग का चोली – दामन का साथ है । साथ ही शिक्षा विभाग भी इन दोनों से ही जुड़ा हुआ है और इन तीनों विभागों के बगैर सरकार का गुजारा नहीं । माननीय न्यायालय और मानव अधिकार आयोग के आदेश के बावजूद शिक्षकों को शराब की दुकान से लेकर पशुओं की गणना तक में जोत दिया जाता है । इस तरह कलेक्टर राजस्व विभाग के कर्मचारियों को बचा ले जाते हैं जबकि पटवारी से राजस्व निरीक्षक तक इस काम में माहिर हैं । शिक्षकों की तरह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी मूक और निरीह प्राणी हैं । यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग के चतुर चालाक अधीक्षक या बी एम ओ अपने विभाग के कर्मचारियों के काम भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं पर थोप देते हैं । जबकि इनके ऊपर पहले से ही विभागीय काम का बोझ लदा रहता है । फिर भी कहीं कोई विरोध नहीं होता । आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा आत्महत्या किये जाने का ग्राफ बढ़ता जा रहा है । ऊपर बैठे अधिकारी मलाई खा रहे हैं । दूसरी ओर कुपोषण बढ़ता जा रहा है । जिससे बच्चों की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती जाती है । अंततः वह कोरोना जैसे रोग की चपेट में आसानी से आ जाता है । मुझे एक बात समझ नहीं आती जब पूर्व उप मुख्यमंत्री तथा महिला बाल विकास मंत्री जमुनादेवी ने प्रतिनियुक्ति पर विभाग में आये अनुभवी पुरुष पर्यवेक्षकों को वापस उनके विभाग में भेज दिया था तो परियोजना अधिकारी के पद पर पुरुष अधिकारी कैसे पदस्थ हैं ? दूर मत जाइए जिले में ही इन अधिकारियों के कारनामे देखिए । पिछले दिनों सी डी पी ओ , केसला योगेश घाघरे की एक वेतन वृद्धि रोककर कलेक्टर साहब ने अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली । जबकि न तो ये परियोजना अधिकारी सतत् मॉनिटरिंग कर रहे हैं और न ही आंगनबाड़ी केंद्रों पर नियमित रूप से पोषण आहार बट रहा है । बच्चों को पोषण आहार वितरण में लापरवाही की इतनी सी सजा । बात कुछ गले नहीं उतर रही । माननीय कलेक्टर महोदय पहले ये तो पता कर लेते कि ये परियोजना अधिकारी इस आदिवासी विकासखंड में कितने सालों से पदस्थ है ? वो कौन सा ग्रुप है जिसमें इस अधिकारी ने एक आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट की थी ? फिर भी उसका बाल बांका नहीं हुआ । जिला प्रशासन इस अधिकारी का कुछ बिगाड़ नहीं पाया । खैर । फिलहाल बात कोरोना की । घाघरे की चर्चा आगे कभी ।

चिंता का विषय ये है कि शहर में कोरोना पैर पसार रहा है और लॉक डाउन कोई हल नहीं है । इस बात को शासन , प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों तक ने स्वीकार किया है । जैसा मैंने ऊपर कहा दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए । जांच का दायरा बढ़ाया जाए । बाहर से आने वाले यात्रियों की सतत् निगरानी और उनकी जांच प्राथमिकता के आधार पर की जाए । संक्रमितों को अनिवार्यतः क्वारंटाइन किया जाए । क्वारंटाइन लोगों पर लगातार नज़र रखें । ठीक इसी तरह कंटेन्मेंट जोन की भी सतत् मॉनिटरिंग करें । पुलिस प्रशासन की ये जिम्मेदारी है कि इस एरिया में आवाजाही पर सख्ती से रोक लगाई जाए । प्रमुख सचिव से लेकर एस डी एम तक मात्र खानापूर्ति के लिए दौरे न करें । इटारसी बेहद संवेदनशील शहर है । यहां के नागरिक जागरूक हैं । इसलिये स्थिति की गम्भीरता को समझें । खुद भी नियमों का पालन करें तब नागरिक अपने आप स्वयं की जिम्मेदारी तय कर लेंगे । नियमों का पालन करेंगे । वैसे भी कर ही रहे हैं । अपनी जान की किसे चिंता नहीं है । हमारे माननीय प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी तो यही कहते हैं – जान है तो जहान है ।

6 COMMENTS

  1. आदरणीय चाचा जी आपका आभारी हूँ जो आपने मेरी बात को समझा और उसको प्रोत्साहित किया। यहां मैं कुछ बिंदुओं पर ध्यान आकर्षण करना चाहूंगा एक तो ये कि जिस प्रकार कोरोना संक्रमित व्यक्ति की रिपोर्ट नेगेटिव आने पर 3 बार और सेम्पलिंग की जाती है। ठीक उसी प्रकार पॉजिटिव आने पर भी कम से कम 3 बार टेस्टिंग की जाए। नेगेटिव आने पर तीन बार की जाने वाली टेस्टिंग ये साबित करती है कि आरटी पीसीआर टेस्ट किट संदेहास्पद है और देश भर में इसके अनेकों उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। दूसरा यह कि किसी भी मरीज को फ्लू के लक्षण होने पर सीधे कोरोना टेस्ट करने के साथ साथ अन्य टेस्ट जैसे डेंगू भी किया जाये। हर साल यह समय डेंगू के पीक का समय होता है। कहीं ऐसा न हो कि किसी अन्य कोरोना के डर के माहौल के कारण किसी गंभीर बीमारी को नजरअंदाज कर कोरोना का ही इलाज दिया जाए और मरीज को लापरवाही का खामियाजा भुगतना पड़े।

    • आभारी हूं स्नेही सौरभ । हमें सभी पक्षों का ध्यान रखना होगा । मैं हमेशा की तरह आप से सहमत हूं ।

  2. इस विषय को और आगे ले जाने की जरुरत है आपने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है

  3. धन्यवाद युवा प्रवर्तक को जिसके माध्यम से मुझे मेरी जन्मस्थली कर्म स्थली इटारसी की खबरें मिलती रहती है कोरोना के बारे में स्थिति जानकर दुख हुआ साथ में आश्चर्य भी हुआ कि प्रशासन इतना सुस्त कैसे हैं आप हमारे यहां मुंबई में आकर देखें कि प्रशासन किसे कहते हैं

  4. युवा प्रवर्तक वेब पत्रिका के माध्यम से गंभीर ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌समस्याओं को सामने लाने का प्रयास स्तुत्य है। बस सरकार ‌‌‌औ उच्च प्रशासन तक पहुंचना चाहिए और तुरंत निदान होना चाहिए।

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