काव्यभाषा : मां जीत गई, मैं हार गई – अंकिता जैन अवनी, अशोकनगर मप्र

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मां जीत गई, मैं हार गई

“मां जीत गई, मैं हार गई”
सोचा पढ़ लिखकर, कुछ बन जाऊंगी,
फिर अपनी समझदारी, दुनिया पर झड़ाऊंगी।
पर मां की सूझ-बूझ के आगे
मेरी समझदारी बेकार गई,
मां जीत गई, मैं हार गई।
सोचा था शेक्सपियर, टैगोर की,
बड़ी-बड़ी बातें मां को बताऊंगी,
पर मां अपने अनुभवों से
सिखा जीवन का सार गई,
मां जीत गई मैं हार गई।
अपनी तरक्की में मैं इतना खो गई,
कि मां के प्रति अपना फर्ज भूल हर बार गई,
पर मां ने हमेशा अपना फर्ज निभाया,
सच मां तुम जीत गई, मैं हार गई।
आज इस दुनिया को प्रेम की नजरों से देखती हूं,
क्योंकि मेरी मां दे मुझे प्रेम का उपहार गई,
मां हर बार की तरह
इस बार भी,
तुम जीत गई मैं हार गई।

अंकिता जैन अवनी
लेखिका/कवयित्री
अशोकनगर मप्र

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