सरोकार : भूखंड अधिकार और समाज ही स्वार्थ पैदा करता है

Email

    भूखंड अधिकार और समाज ही स्वार्थ पैदा करता है

पिछले दिनों मैं अपने तीन मित्रों के साथ पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सुर्ख़ियों आये बैतूल के कोचामाऊ गाँव में सीधा सादा जीवन व्यतीत करते हुए तीन दशकों से भी ज्यादा समय से आदिवासियों के साथ रहते हुए उनके जीवन को बेहतर बनाने का काम कर रहे अलोक सागर से मिला. मेरे साथ मेरे लायंस क्लब इटारसी के साथी मित्र रमाकांत सैनी, अयूब खान और सर्वजीत सिंह सैनी उनसे मिलने के लिए गए थे. उनसे मुलाकात हमारे भाग्य से केसला के निकट के छोटे से गाँव भुमकापुरा में आदिवासी नेता फागराम के निवास पर हो गई.
अलोक सागर जी से मिलने के लिए सबसे पहले मैंने इटारसी की हमारी पर्यावरण मित्र संस्था के साथी बृजमोहन सोलंकी से संपर्क किया. बृजमोहन सोलंकी हमारे के अन्य मित्र चंद्रशेखर मिश्रा की धर्मपत्नी विद्या मिश्रा जी के साथ उनके महिला संगठन के साथ पिछले कई वर्षों से केसला ब्लाक और उससे लगे बेतुल जिले में आने वाले कुछ आदिवासी गावों में शहर से संग्रह किये गए ऊनि एवं अन्य वस्त्र कुछ गृह उपयोगी सामग्री का वितरण करने जाते रहे हैं. उन्होंने बीते शीतकाल में अलोक सागर से मुलाकात की थी जिसका जिक्र उन्होंने किया था और मुझे उनसे मिलने का आग्रह भी किया था. हालाँकि जब मैं उनसे मिला तब मुझे उनसे बातचीत के दौरान ध्यान आया कि इस अंचल में आदिवासी लोगों की बेहतरी के लिए काम करने वाले सुनील गुप्ता के साथ किसी गोष्ठी में मिल चूका हूँ. सुनील जी इटारसी के एम जी एम कॉलेज के रिटायर प्राचार्य विद्वान प्रोफेसर कश्मीरसिंह उप्पल की मदद से इटारसी में अनेक ख्यातनाम लोगों की गोष्ठियां आयोजित कराया करते थे उन गोष्ठियों में जनसत्ता के एडिटर रहे प्रभास जोशी, भारत पाकिस्तान संबंधों के जानकार कुल्दीप नैय्यर, समाजवादी विचारक किशन पटनायक, राजनीति विश्लेषक योगेन्द्र यादव, नर्मदा आन्दोलन से जुडी मेधा पाटकर अदि से मिलना भी हुआ था. शायद इन्हीं में से किसी के इटारसी आगमन पर आयोजित किसी गोष्ठी में अलोक सागर से मुलाकात जरुर हुई थी इसलिए उन्हें देखकर और थोड़ी देर चली बातों में ध्यान आ गया था.
बृजमोहन सोलंकी ने फागराम raके साथ राजनीतिक कार्यक्रमों प्रदर्शनों में सुनील जी के मार्गदर्शन में साथ रहने वाले युवक राजीव बामने का नाम लेते हुए कहा कि राकेश बामने उनसे मुलाकात करवाने में मदद कर देगा. राजीव को संपर्क करने की कोशिश बेकार गई क्योंकि उसका मोबाइल कनेक्ट नहीं हो पा रहा था, ऐसे में फिर अचानक बृजमोहन सोलंकी का कॉल आया कि राजीव इटारसी में ही किसी काम से आया था और अभी साथ में ही है. और इस तरह से राजीव से उसका दूसरा नंबर भी मिल गया और कोचामाऊ जाने की योजना भी बन गई.
अब हम चारों जिस दिन सुबह कोचामाऊ जाने वाले थे उसकी पूर्व संध्या पर राजीव को कॉल किया तो पता चला कि उसका मोबाइल घर पर ही छूट गया है और वो रत तक लौटने वाला है. लेकिन राजीव जैसे ही गाँव पहुंचा और उसने हमारी कॉल की जानकारी मिलते ही हमें कॉल क्या और बताया कि अलोक जी से केसला में ही मुलाकात हो जाएगी वो भुमका में फागराम के निवास पर ठहरे हुए हैं. ये खबर हम लोगों के लिए प्रसन्नता भरी थी क्योंकि कोचामाऊ के बनिस्बत भुमका ज्यादा नज़दीक था और आने जाने में कम समय लगेगा इसके बदले में हम उनसे ज्यादा देर के लिए मुलाकात कर सकेंगे.
अगले दिन सुबह करीब पौने दस बजे हम भुमका पहुँच गए वह पता चला कि फागराम अपने खेत पर काम करने निकल गए हैं और अलोक जी घर पर ही हैं. फागराम जी के निवास पर आदिवासी महिलाएं गुल्लियाँ साफ कर रही थीं. गुल्ली महुआ के पेड़ के फल को कहते हैं और पकी हुई गुल्ली का तेल निकलता है जो स्वाद में थोडा कड़वा लेकिन बहुत पौष्टिक होता है.आदिवासी अंचल में इस बार महुआ खूब फला था इसलिए घर घर में आदिवासी परिवारों के सभी बड़े सदस्य करीने से गुल्लियों के छिलके निकल कर अलग करने में लगे हुए थे. गुल्ली का तेल आदिवासी परिवार अपने भोजन पकाने और खाने में इस्तेमाल करते हैं.
फागराम के घर में पता चला कि अलोक जी अल्पाहार कर रहे हैं, थोडा इंतज़ार करने के बाद अलोक सागर घर से बाहर निकले और फिर हमें बाजु के दुसरे घर में साथ ले आये. इस घर में जमीं पर हम सबको बैठने को कहते हुए आलोक भी जमीं पर बैठ गए, इस बीच मैं अपने मोबाइल और साथ लाये कैमरा स्टैंड को सेट करने लगा तो आलोक जी ने ऐसा न करने को कहकर कैमरा बंद करवा दिया. हमने भी कैमरे से तस्वीर लेने की बजाए उनके साथ बैठकर बातें करने को हो महत्वपूर्ण माना. बहुत देर तक बहुत सारी बातें हम उनसे करते गए बीच में मैंने उनकी भाषाई उच्चारणों से समझ लिया था कि वो मूलतः पंजाबी भाषी है. इसके बाद थोड़ी देर तक सर्वजीत और मैं उनसे पंजाबी भाषा में भी बात करते रहे.
जिस घर में हम बैठे हुए थे वहीँ उस घर की दो आदिवासी महिलाये भी आकर हम लोगों की बातों को सुन रही थी. लगभग पौन घंटे बाद उन्होंने संकोचवश कहा कि हम लोग जहाँ बैठे हैं वहां पंखा नहीं है और कुछ आवभगत की व्यवस्था भी नहीं है, इस पर मैंने आगे बढ़ते हुए उनसे गुड वाली काली चाय की मांग कर डाली. उन्होंने खुश होते हुए महिलाओं से आदिवासी बोली में चाय बनाने को कहा और खुद उठाकर बाहर आंगन में लगे नीबू के पत्ते तोड़ लाये और अन्दर चले गए. थोड़ी देर बाद हमारे चारों के सामने काली चाय आ गई. चाय हमारे सामने रखते हुए महिला बोली कि चाय सागर जी ने ही बनाई है. ये हमारे लिए एक विशेष सम्मान था.
अलोक सागर क्या हैं और क्या करते हैं ये कोई भी यूट्यूब पर सर्च में अलोक सागर टाइप करके देख सकता है. इस पूरे आलेख में उनके बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं कर रहा हूँ, लेकिन इतना जरूर बताना चाहूँगा कि जिस मुलाकात की आस लेकर हम गए थे उससे कहीं ज्यादा आनंद की अनुभूति लेकर हम लौटे थे. सर्वजीत ने जो प्रश्न उनसे किया था उसका उल्लेख जरुर करना चाहता हूँ. सर्वजीत ने उनसे पूछा कि आपको क्या ख़ुशी और कैसे इसमें ख़ुशी मिली या मिल रही है कि आप सबकुछ छोड़कर यहाँ चले आये, इस पर उनका सरल सा जवाब था की आप लोग यहाँ मुझसे मिलने आये तो क्या करने आये हो. इस एक लाइन के उत्तर में सब कुछ था हालाँकि इस बारे में भी थोड़ी देर तक बातें जरुर हुईं. उनकी एक बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया कि यदि हम प्रकृति में हर किसी हदबंदी या अधिकार की बातें छोड़ दें तो सारी दुनिया हमारी है. भूखंड की रजिस्ट्री और सामाजिक जीवन ही स्वार्थ पैदा करता है, ये न हो तो वसुधैव कुटुम्बकम सर्वत्र व्याप्त है.

1 COMMENT

  1. जी सर बहुत अच्छा लगा। भूमि को हम धरती माता ‌‌‌‌‌कहते हैं और उस पर अधिकार कर सौदा भी करते हैं। कुछ तो होना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here