काव्य भाषा : जीवन – गोविंद राव चौरे

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जीवन

जीवन कोई पतझड़ नहीं, एक रसमय बसंत है।
पथ यह दुर्गम, दुरूह सही, पर अनंत है।

बचपन कोई खेल नहीं, एक हसीन मौका है।
सारे सफर में ठंडी हवा का झोंका है।

यौवन कोई उम्र नहीं, क्षणभंगुर पल है।
रेत का टीला है, बीता हुआ कल है।

बुढ़ापा है त्रासदी, नाटक का पटाक्षेप।
पात्र के अभिनय पर निर्देशक का आक्षेप।

दौलत कोई शेर नहीं, हल में जुता बैल है।
खून है, पसीना है, हाथों का मैल है।

सारे अहसास एक कटु सत्य, शाश्वत ज्वलंत हैं।
फिर भी जीवन कोई पतझड़ नहीं, एक रसमय बसंत है।

गोविंद राव चौरे

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