लघुकथा : बदलाव – सत्येंद्र सिंह , पुणे

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लघुकथा
बदलाव

मेरे मित्र कुलदीप पाटिल के बड़े भाई वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हैं। जब एसएसपी साहब की पोस्टिंग नगर में हुई तो पता चल ही गया था। उच्च पुलिस अधिकारी से मैं कभी मिला नहीं था। मैंने कुलदीप से कहा कि चलो एसएसपी साहब का स्वागत करने चलें, इस बहाने मैं भी मिल लूंगा। कुलदीप ने हां कह दिया तो मैं बहुत खुश हुआ। करीब एक सप्ताह बाद कुलदीप ने कहा चलो बंगले पर, भाई ने टाइम दे दिया है। जब हम बंगले पर पहुंचे तो कुलदीप ने गाड़ी गेट पर तैनात सिपाही के इशारे के अनुसार जगह पर लगादी। गेट पर पहुंच कर बताया कि साहब से मिलना है तो सिपाही ने रजिस्टर सामने रख दिया। पेन देते हुए बोला कि एंट्री कर दो। कुलदीप ने बताया कि मैं उनका भाई हूं तो सिपाही ने बड़ी नम्रता से कहा, ठीक है साहब, मैं खुद जाकर रजिस्टर दे आऊंगा बस आप एंट्री कर दिजिए। एंट्री करा कर तेज चाल से अंदर ही ओर गया और हमें गेट के पास कुर्सियों पर बैठा गया। हमें बैठे पांच मिनट हुए होंगे कि अंदर से जीप की आवाज़ आने लगी। वह सिपाही जीप के पीछे दौड़ा आ रहा था। जीप गेट के पास आकर रुकी, एसएसपी साहब आगे की सीट बैठे थे। अरे कुलदीप, कहते हुए नीचे उतरे और बोले यहां कैसे और घर क्यों नहीं आए। कुलदीप ने कहा कि यहीं मिलने का टाइम दिया था न…….और पूरी बात सुने बिना एसएसपी साहब बोले, हां याद आया। लेकिन एक मर्डर हो गया है, मुझे तुरंत जाना है। मेरी तरफ़ देखते हुए बोले, बंधु फिर जल्दी मिलेंगे। और मेरे हाथों में गुलदस्ता देखकर बोले, यह मत लाना। जीप मेंं बैठकर चले ‌गये। कुलदीप ने अपनी गाड़ी की ओर बढते हुए कहा, मैंने बताया था न कि भाई बहुत बिजी रहते हैं। मैंने हां में सिर हिलाते हुए कहा कि देखा न।
यह बात दिसंबर जनवरी की होगी क्यों कि कुछ दिनों बाद कोविद 19 के कारण काफी सावधानी बरतना प्रारंभ हो गया था और पुलिस और भी व्यस्त हो गई। अब एसएसपी साहब से मिलने का सवाल ही नहीं था। सुनने में आ रहा था कि बहुत जरूरी होने पर ही घर से निकलना संभव हो सकेगा। पर मास्क और सेनेटाइजर की शुरुआत हो गई थी। मैं और कुलदीप किसी अति आवश्यक काम से उनके बंगले के सामने से निकल रहे थे। कुलदीप ने गाड़ी रोकी और बोले कि भाई का तो पता नहीं, बहिनी (भाभी) से मिल लेता हूं, अत्या का ‌फोन भी आया था। गेट पर‌ पहरे वाले सिपाही से कहा कि साहब के‌ घर जाना है। उसने‌ फोन घुमाया और पूछा, हम लोगों को अंदर जाने दिया। अंदर पहुंचे तो देखा कि लॉन में एक कुर्सी पर बैठे एसएसपी साहब जल्दी जल्दी खाना निगल रहे हैं। कुलदीप ने कहा,खाना और शाम के‌ चार बजे, साहब मेम साहब से खाते खाते बोले, इन्हे भी खाना खिलाओ। मैम साहब अंदर की ओर मुड़ते मुडते बोली, कुलदीप तुम्हारे भाऊ कल शाम के निकले अभी आये हैं। और खाकर तुरंत जाना भी है। एसएसपी साहब ने अंदर जाती हुई मैम साहब की ओर देखते हुए कहा, कुलदीप लोग सोचते हैं पुलिस अफसर मौज करते हैं। रात को हायबे पर प्रवासी मजदूरों से भरी एक लॉरी पलट गई। दो मजदूर मर गये और सभी घायल। ये बेचारे अपना पेट भरने के लिए यहां आते हैं और अब अपने परिवार के पेट के लिए महामारी से डर कर भाग रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि ऐसे माहौल में उनका अपने प्रदेश गांव में क्या होगा। हम क्या करें, कैसे रोकें। रोकते हैं तो अपने अपने परिवार की जो कहानी सुनाते हैं कि आंखों मेंं पानी आ जाता है। हमें दिल से जाने देना है और दिमाग से रोकना है। ऊपर के आदेशों का पालन करना है और इंसानियत भी बरतनी है। इसलिए रोक कर डॉक्टरी जांच तुरंत‌ करवाते हैं । तभी बहिनी जी हाथ में ट्रे लिए आ गईं। साहब चले गये। लॉन की बेंच पर ट्रे रख दी। हम लोग कुर्सियों पर बैठे जल्दी जल्दी चाय खत्म करने लगे। बोल तो किसी का फूट ही नहीं रहा था।
मैं सोच रहा था कि आज युवा पीढ़ी मेंं जो बदलाव दिख रहा है, उसके जनक वे स्वयं हैं। शासन और सेवा दोनों को अपने कर्तव्य की धुरी बना लिया है।
सत्येंद्र सिंह
पुणे

12 COMMENTS

  1. वास्तविकता बयान करती बहुत सुंदर लघु कथा है आशा है श्री सत्येंद्र सिंह की कलम से हमें और भी कहानियां पढ़ने को मिलेंगी वे एक सशक्त कहानीकार हैं

  2. आज के माहौल को साकार करती दिल को छू लेनेवाली कहानी।

    • बहुत सुंदर, यथार्थ का चित्रण करने वाली लघुकथा।

  3. आपकी इस लघुकथा में कर्तव्य को महत्व दिया है जो हर व्यक्तियों को निभाना चाहिए।
    इस लघुकथा से निश्चित ही पढ़ने वाले व्यक्ति को एक सीख मिलेगी जिसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

  4. वर्तमान परिवेश का यथार्थ चित्रण करती हुई कहानी एक लंबे समय के बाद मिली। “बदलाव” कहानी के कुछ परिदृश्यों से हमारी भूली-बिसरी यादें स्मृति-पटल पर ताजी हो गई। इस सशक्त रचना के लिए साधुवाद।

  5. वर्तमान परिवेश का यथार्थ चित्रण करती हुई कहानी एक लंबे समय के बाद पढ़ने के लिए मिली। “बदलाव” कहानी के कुछ परिदृश्यों से हमारी भूली-बिसरी यादें स्मृति-पटल पर ताजी हो गई। इस सशक्त रचना के लिए आपको बधाई एवं साधुवाद।

  6. बहुत ही सुंदर लघुकथा है….और लेखन शैली बहुत अच्छी…

  7. एक बेहतरीन लघुकथा है ये। आपकी लेखन शैली भी बहुत सहज सुंदर है जो पाठक को अंत तक बांधे रखती है।
    आप लिखते रहिएगा सर।

  8. फूफाजी आपकी कहानियां हमेशा जीवन में कुछ नई सीख लेकर आती हैं।
    ऐसे ही लिखते रहिए और युवाओं को प्रेरित करते रहिए।

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