काव्यभाषा: चलते रहना ही जीवन है -डॉ संगीता तोमर इंदौर

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चलते रहना ही जीवन है

जीवन है संघर्ष की बेदी
जिसमें समिधा है हर पल,हर क्षण
कोई सुख का कोई दुख का
बीत जाना है उसकी नियति
जैसे रुकता नहीं है ये क्षण
चलते रहना ही जीवन है

यदी कहीं हम थके और रुके,
पृथ्वी कहां घूमने से चुके
रात और दिन , छाव और धूप
दिन के पहर भी बदले रूप
सुबह ताज़गी, दिन की ऊर्जा,
सुस्त दोपहरी, सौम्य संध्या, मौन है रात्री
समय चक्र पर मौसम बदलते
जीवन चक्र के भाव बदलते
कभी शुष्क,कभी भीगा ,
कभी श्वेत, कभी रंगों से सजीला
कुछ अलग है हर दम, हर क्षण
समय धूरी है पृथ्वी की नियति
थमती कभी नहीं ये धरती
चलते रहना ही जीवन है

ऊंचे पर्वत और चट्टाने,
मार्ग रोकते है नदियों का
उन्हें चीर के आगे बढ़ती
जीवन में आते कई पड़ाव
रूप बदलती, चलती रहती
कभी कांच सा झरना बनती
बन जाती कभी नन्हीं धार
मंद- मंद बहती है कहीं पर
और कभी हो जाती है विकराल
मैदान ,पर्वत ,समतल धरती सब कर जाती है वह पार
पर ना रूकती , बहती रहती है वह
जब तक ना मिलती सागर धार
बहते रहना है उसकी नियति
चलते रहना ही जीवन है

कभी देखा है उन पंछियों को उड़ते
जो आते है दूर देश से
जलवायु में घुलते- मिलते
करते नए नीड़ का निर्माण
त्यागना है ये सब जाने वो
जैसे मौसम करवट लेता
हो जाते फिर उड़ने को तैयार
अनवरत यात्रा है उनकी नियति
चलते रहना ही जीवन है
तभी होगा भव सागर पार

डॉ संगीता तोमर
इंदौर

1 COMMENT

  1. बहुत सही लिखा डॉक्टर साहिबा। जीवन का दूसरा नाम संघर्ष ही है।

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