काव्य भाषा : हार कहां हमने मानी है -डॉ संगीता तोमर इंदौर

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हार कहां हमने मानी है

जीवन के पथ में
आए अनगिनत पड़ाव
दुःख-सुख ,ग्लानि, भय और चिंता
कड़वी यादों को बिसार
हार कहां हमने मानी है
जाना है भव सागर पार

कभी अपनों का साथ है छूटा
कभी कुंठा से मन है टूटा
कभी तानों के सहे है वार
कभी मित्रों ने किए है वार
हार कहां हमने मानी है
चलते रहे करते सुविचार

कभी लगा बहुत दूर है लक्ष्य
मृगतृष्णा है ये जीवन
भूल भुलैया है ये मार्ग
पग में कांटे, हाथ में छाले
हर कण में थकन और घायल मन
फिर समझाया अपने मन को
रण छोड़ना नहीं है कोई उपाय
हार कहां हमने मानी है
सहते रहे समय की मार
चलते रहे मन को समझाए

मृत्यु से नज़रे में मिलाई
थामे रहे सांसों की डोर
ना बुझने दिया आशा दीपों को
उठ खड़े हुए चलते लक्ष्य की ओर
हार कहां हमने मानी है
समझ लिया जीवन का सार

जो पाना था वो मिला नहीं
जो चाहा था वो छुटा सभी
प्रयत्न किए पर हुए विफल
जो पाया था वो भी हुआ स्वाहा पर हार कहां हमने मानी है
फिर नई दिशा में बढ़ना है
सपनों को फिर सच करना है
छट जाएंगे बादल गहरे
फिर खिलेगी सुनहरी धूप

डॉ संगीता तोमर
इंदौर

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