काव्य भाषा : आशा – राजीव रंजन शुक्ल ,पटना

Email

आशा

शारीरिक ,नैतिक ,और सामाजिक दुर्दशा
पर सिर्फ हँसते रोते निकलता सार्थक वक्त
दूसरों के दर्द और हाहाकार पर
जब नहीं हो संवेदना व्यक्त
वक्त जब कार्य और विचार का आता
नेतृत्व जब शुतुरमुर्ग सदृश सिर छुपाता
समाज जब सुविधा से मूल्य तौलता
नफ़रत, स्वार्थ, क्रूर-हिंसा की
बढ़ती भीषण आँधी
बोलो कहाँ कौन बनेगा युग का गांधी
उदास चेहरों पर लाना मुस्कान
नहीं होता है आसान
ऐसे चाहने वालों का हर पग सामर्थ्य परखता है
गलत को गलत कहना जब हो कठिन
अप्रिय अतीत से भयभीत भविष्य
डराता है स्वयं को जब प्रतिदिन
लाएगा कौन उजाला
कौन पिएगा विष का प्याला
दूसरों का है दायित्व
आम को समझा जब नेतृत्व खिसकता
आत्मकेंद्रित विचार का जब उदासीन समाज पनपता
केवल ईश्वर पर ही आश्रित पौरुष जब रोता
गरीब ,पीड़ित ,असहाय अस्मिता और सत्य है तब सिसकता
स्व-परिधि मे सीमित समाज
गांधी ,सुकरात और सिद्धार्थ को
जन्म नहीं लेने दे रहा आज
बढ़ रही ,बह रही
नफ़रत, स्वार्थ, क्रूर-हिंसा की आँधी
पर आएगा अवश्य एक दिन
समाज बनेगा नफ़रत, स्वार्थ, और हिंसा बिन
घने निराशाओं की रात
आएंगे सुकरात
पीने विष का प्याला
आएंगे फिर कोई दधीचि
समाज के लिए
अपनी हड्डी गलाने वाला ॥

राजीव रंजन शुक्ल
पटना

6 COMMENTS

  1. हार्दिक आभार श्री देवेन्द्र भाई जी… सुप्रभात

  2. राजीव जी तड़प तब और ज्यादा होगी जब नीति नियंताओं की नींद उड़ जाए। सब जानते हैं कि जाने वाला कभी लौटकर नहीं आता तो फिर प्रतीक्षा किसकी। गांधी सुकरात के बाद कोई कुछ और नहीं बन सकता क्या? हम हैं, हमारी समस्याएं हैं, उन्हें दूर करने कोई बाहर से या ऊपर से क्यों आएगा। कहिए कि उठो धरा के लाल, तुम्हें धरा पुकारती। सुंदर कविता के लिए बधाई।

  3. बहुत बहुत धन्यवाद सत्येन्द्र जी, सही टिपण्णी हैं आप की समस्या हमारी है, हम ही इसका समाधान करेंगे। धन्यवाद आपका 🙏

  4. बहुत उम्दा लेखन और अत्यंत सुंदर रचना।
    शुभकामनाएं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here