नागरिक पत्रकारिता : एलोपैथी के अतिरिक्त अन्य पैथियों से इलाज पर भी विचार करे प्रशासन -सौरभ दुबे ,युवा पत्रकार

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नागरिक पत्रकारिता –
एलोपैथी के अतिरिक्त अन्य पैथियों से इलाज पर भी विचार करे प्रशासन
भीलवाड़ा ने सेनेटाइज करके पेश किया था कोरोना मुक्ति का मॉडल,इटारसी इलाज के विकल्प का मॉडल पेश करे

किसी भी मरीज को या उसके परिवार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह इलाज किस पद्धति से कराना चाहता है। एलोपैथी से, होम्योपैथी से, आयुर्वेद से या नेचरोपैथी से। कोरोना के मामले में तो मरीज को कैदी की तरह व्यवहार किया जा रहा है। उसे एम्बुलेंस में बिठाकर एक ही पद्धति से एक ही जगह इलाज करवाने को मजबूर किया जा रहा है। जबकि सभी पद्धतियों से मरीज ठीक हो रहे हैं। और ऐलोपैथी के अलावा अन्य पद्धतियो में साइड इफेक्ट भी नहीं होते। जाहिर है ड्रग माफिया के दबाव में पूरा षडयंत्र चल रहा है।

जो लोग एलोपैथी के अतिरिक्त किसी अन्य पद्धति से इलाज करने की बात यू ट्यूब या फेसबुक पर कर रहे हैं उनके वीडियो और उनकी पोस्ट इन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से हटा दी जा रही है साथ ही उन्हें चेतावनी दी जा रही है। ऐसी ही एक पोस्ट एक्टिविस्ट और पत्रकार संत समीर ने डाली थी जिसे फेसबुक ने डिलीट कर दिया। अपनी आप बीती बताते हुए संत समीर कहते हैं कि “यूट्यूब के बाद अब फेसबुक की कृपा भी मुझ पर बरसनी शुरू हो गई है। मेरी परसों की पोस्ट फेसबुक ने कल डिलीट कर दी। पोस्ट में एकदम सौ फ़ीसद सही एक जानकारी भर थी कि कैसे चलने-फिरने में असमर्थ और वेण्टिलेटर की हालत में पहुँच रहा एक मरीज़ होम्योपैथी और आयुर्वेद से एक दिन ही दिन में चलने-फिरने लायक़ हो गया।”

तीन दिन पहले ‘आजतक’ चैनल के पत्रकार विकास मिश्र की पोस्ट भी फेसबुक ने डिलीट कर दी, क्योंकि उन्होंने अपनी पोस्ट में आर्सेनिक अल्बम की तसवीर लगा दी थी। कमाल है, ज़हरीली से ज़हरीली एलोपैथी दवाओं की तसवीर लगाओ तो ज़िन्दाबाद..और होम्योपैथी की तसवीर लगा दो तो शेम शेम!

फेसबुक द्वारा जो मैसेज भेजे जा रहे हैं, उसका आशय कुछ ऐसा निकलता है कि कुछ हेल्थ ऑर्गेनाइजेशनों को लगता है कि होम्योपैथी आयुर्वेद को बढ़ावा देती पोस्ट से लोग अस्पतालों और एलोपैथी डॉक्टरों के यहाँ जाकर मेडिकल ट्रीटमेण्ट लेने से बिदकेंगे।
यहां सवाल यह उठता है कि क्या मेडिकल ट्रीटमेण्ट की परिभाषा बस उतनी है, जितनी डब्ल्यूएचओ तय करता है ? विज्ञान के कई तथाकथित ठेकेदारों को लगता है कि सिर्फ़ एलोपैथी ही विज्ञान है और बाक़ी सारी पैथियाँ अविज्ञान हैं, जादू-टोना हैं।

जो भी लोग कोरोना काल में अन्य पैथियों की बात कर रहे हैं उनको लेकर ये भ्रम फैलाया जाता है कि वे ट्रीटमेंट नहीं लेने की बात कर रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है। वे तो बस विकल्प की बात कर रहे हैं। किसी ने भी नहीं कहा कि किसी को कभी मेडिकल ट्रीटमेण्ट नहीं लेना चाहिए। 

विज्ञान के अन्धविश्वासियो को यह समझना चाहिए कि भगवान् ने केवल एलोपैथी को मेडिकल साइंस का झण्डा थमाकर आसमान से नहीं टपकाया है कि बेटा जाओ धरती पर…मनुष्य जाति के एकमात्र तारणहार तुम ही हो। यह समझना चाहिए कि हर पैथी का कुछ ख़ास स्थितियों में बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।

जिन्हें भी लोगों की जान बचाने की चिन्ता है, वे दुनिया में मौजूद हर सम्भावना पर विचार कर रहे हैं, पर जिन्हें सिर्फ़ लोगों की जेबें ख़ाली करने में रुचि है, वे ज़रूर बाक़ी सारी सम्भावनाओं को दरकिनार करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ लोग विज्ञान के नाम पर मानसिक बीमार होते हैं।

तीन-चार एलोपैथी डॉक्टरों की ऐसी कहानी है कि वे वायरस से सङ्क्रमणग्रस्त होकर कराहते रहे, पर कहने पर भी होम्योपैथी या आयुर्वेद लेने से इनकार करते रहे कि अगर इन पैथियों से आसानी से ठीक हो गए तो उनके महान् मेडिकल साइंस की साख कम हो जाएगी। समझदारों की मूर्खताएँ ऐसी ही होती हैं। इनसे कहना चाहिए कि भाई, आप तो प्रोटीन वग़ैरह के भाँति-भाँति के पाउडर और हेल्थ सप्लिमेण्ट खा-खाकर काम चलाओ, क्योंकि फल-सब्ज़ी-अन्न खाने का मतलब है कि एक तरह से आप प्राकृतिक चिकित्सा या आयुर्वेद अपना रहे हो। नहाना भी छोड़ दो, क्योंकि भाँति-भाँति के स्नान से प्राकृतिक चिकित्सा वाले इलाज करते रहते हैं।

बहरहाल, जिस पैथी में जिस बीमारी का बेहतर इलाज मिले, उसमें बेहिचक जाना चाहिए। जब सारी दुनिया के डॉक्टर-वैज्ञानिक कह रहे हैं कि वर्तमान महामारी का अभी हाल एलोपैथी में कोई समाधान नहीं है, तो दूसरी सम्भावनाओं पर विचार करने में आख़िर क्या हर्ज़ है? इसके उलट, कुछ देशों में होम्योपैथी और आयुर्वेद पर पाबन्दी तक लगा दी गई है, तो इसका सिर्फ़ यही मतलब लगाया जा सकता है कि यदि मरीज़ आसानी से ठीक होने लगेंगे तो एलोपैथी का धन्धा ख़राब हो जाएगा।

असली खेल वैश्विक दवा माफ़ियाओं का है! विश्व स्वास्थ्य सङ्गठन में काम कर चुके कई लोग ही यह रहस्य अब खोलने लगे हैं। सोचिए कि जिस बीमारी की दवा आज तक बनी ही नहीं, उसके इलाज का बिल कैसे पाँच से दस लाख रुपये तक आ सकता है? क्या अस्पताल में भर्ती होने बाद क्रोसीन या पैरासीटामाल दिया जाय तो उसका बिल दस लाख रुपये बन जाता है? सवाल तो है ही कि कहीं धन्धे के लिए पूरी दुनिया को डराकर बड़ी संख्या में मारने का खेल तो नहीं चल रहा है?

बरसात के इस मौसम में महामारी के समानान्तर डायरिया से भारत में मरने वालों का आँकड़ा भी रोज़ जारी किया जाय तो यह इस महामारी की तुलना में दो गुने से ज़्यादा हर दिन दिखाना पड़ेगा। सामान्य फ्लू वायरस की आरटी-पीसीआर स्टाइल में देशव्यापी जाँच की जाने लगे तो देश भर में क़रीब दस करोड़ पॉजिटिव मिलेंगे, क्योंकि बिना ऐसी जाँच के भी एक करोड़ फ्लू का अनुमान हर साल का है। सोचिए कि हाल वास्तव में क्या है!

ख़ैर, मैं किसी ख़तरे को कम कर नहीं आँक रहा हूँ। मैं बस यह कह रहा हूँ कि फेसबुक और यूट्यूब लोगों का हौसला बढ़ाने वाली पोस्टों और वीडियो को अगर मिटा रहे हैं, तो एक तरह से बढ़ती मौतों को और बढ़ाने का काम कर रहे हैं। जाने-अनजाने ये भी उस वैश्विक साज़िश के हिस्से बन गए हैं।

एलोपैथी के जो भी लोग अन्य पैथियों की अहमियत समझते हैं, उन्हें ऐसी हरकतों का विरोध करना चाहिए। वास्तव में ये बेजा हरकतें ही अच्छे डॉक्टरों और सेवाभावी लोगों को भी बदनाम करती हैं। होम्योपैथी, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा वालों को सामूहिक और सङ्गठित रूप में सामने आकर कहना चाहिए कि वे वास्तव में आज की तारीख़ में इस महामारी का बेहतर समाधान जानते हैं।

देश के बहुत से हिस्सों में मरीजों को उनके घरों में ही रखकर इलाज दिया जा रहा है। सिर्फ गंभीर रोगियों को अस्पतालों में भर्ती किया जा रहा है। जिला प्रशासन या नगर प्रशासन को इस ओर ध्यान देते हुए कदम बढ़ाने चाहिए। अन्य पैथियों से लोगों को इलाज के विकल्प दिये जाने चाहिए। पूरे प्रदेश ही नहीं देश के सामने उदाहरण पेश किया जाना चाहिए। कोरोना काल में हमने बहुत से मॉडल देखे जिनसे कोरोना से जंग आसान हुई। इटारसी मॉडल भी देश के सामने पेश किया जा सकता है।

सौरभ दुबे युवा पत्रकार
इटारसी

1 COMMENT

  1. बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप। भोपाल में इलेक्ट्रो होम्योपैथी का पाठ्यक्रम चला, लोग पढे, अध्ययन किया, प्रमाण पत्र भी लिया पर अचानक मान्यता समाप्त। आज होम्योपैथी बहुत कारगर हो रही है। मध्य प्रदेश सरकार इसकी मान्यता बहाल करदे तो गरीबों को काफी राहत मिलेगी।

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