काव्य भाषा : अल्फ़ाज़ -फिरोज़ खान, नागपुर

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ग़ज़ल

ये बस्ती तेरे बग़ैर कुछ ऐसी लगती है,
जैसे गुलशन में बाक़ी कोई गुलाब न रहे ! -1

रोता हूँ तो रोने दो मेरा ग़म है तुम्हें क्या,
मुझको यूँ न देखो कि तमाशा मैं नहीं हूँ ! -2

पंखों की बंदिशें और पैरों की बेड़ियाँ,
सब तोड़ मेरा हौसला परवाज़ हो गया ! -3

हसरत-ए-दिल-ए-नाकाम बदल नहीं सकती,
महज़ इरादों की रद्द-ओ-बदल होती है ! -4

गर्दन को ख़ंजर पे तू रखता है तो सुन ले,
इस आशिक़ी में जाने कितनों के सर गए ! -5

मज़ा इसमें भी है कि उनको जलाया जाए,
कि जिनसे रूठने में भी मज़ा, जिनको मनाने में भी ! -6

दिल-ए-मुन्तज़िर को ‘अल्फ़ाज़’ आराम तो आये,
वस्ल मुम्किन नहीं, तो इंतिक़ाल बनके चले आओ ! -7

©® फिरोज़ खान अल्फ़ाज़
नागपुर प्रोपर औरंगाबाद बिहार

स0स0-9231/2017

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